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मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा। 

मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं। 


इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। इस ऊब और बेबसी भरे दिनों में किताब ही सहारा बनी इधर जनवरी से अब तक कई किताबें पढ़ीं,उसमें दो उपन्यास ( सूत्रधार, वह फिर नहीं आई ) चार कविता संग्रह ( अंचित के दो, पराग पावन की एक, देवेश पथ सारिया की एक ) इन सभी अंचित ऐसे कवि हैं जिन्होंने मेरे भीतर के गाढ़ेपन पर प्रहार किया, ऐसा शिल्प, ऐसी भाषा, ऐसा मुहावरा किसी के पास नहीं है, पराग पावन  सोचकर हुए कवि हैं, इनकी कविताओं में दिमाग ज्यादा है, भाषा समाचार पत्रों वाली है।, देवेश कई जगहों पर छूते हैं और कई जगहों पर समझ ही नहीं आता यह कहा क्यूँ है उनके पास भाषा का एक सुंदर ढांचा है लेकिन उसमें घर जैसा भाव नहीं है। दो डायरी पढ़ी, पहली अकेला मेला रमेशचंद्र शाह की दूसरी दिनकर की डायरी। इस पर लंबी चर्चा और विमर्श किया जा सकता है। एक कहानी संग्रह पढ़ा कुणाल सिंह की कहानियों का..बड़ा पुराना सा ढर्रा है पर स्टोरी लाइन अच्छी है। रोचकता बनी रहती है, प्रकृति वर्णन बड़ा सुंदर है इनका। देशजता का सौंदर्य दिखता है भाषा और कहन दोनों में.. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली शुरू किया था, उसके पहले भाग में नामवर सिंह जी की भूमिका पढ़कर अच्छा लगा कई सवाल भी उठे, उसे वहीं रोक दिया उसका आठवां हिस्सा पढ़ा ख़ासकर चिट्ठी के लिए। और अब धीरे धीरे करूँगा। इसी बीच कलमशाला प्रकाशन का भी काम कर रहा हूँ। कुछ किताबों का प्रुफ रीड कर रहा हूँ। कुछ के कवर पर काम हो रहा है। कुछ पांडुलिपि पर विचार कर रहा हूँ। यह काम करके आनंद आता है और डर लगता है कि मेरा लिखना न छूट जाए.... 

यह सब करते हुए भी कुछ नहीं करता हूँ का ठप्पा लिए घूमता रहता हूँ। सोचा था परीक्षा के बाद कहीं घूमने जाऊँगा, आश्वासन भी मिला था। फिर सब जाने कैसे चौपट हो गया। मन में बहुत कलुषित भावनाएं आती हैं कभी कभी मैं उन्हें आसुओं से धुलकर साफ कर देता हूँ। 

जाने क्यूँ मेरे पास आते तक हर नदी सूख जाती है या अपनी धारा मोड़ लेती है। 

डॉक्टर ने कहा आंखों में लुब्रिकेंट की कमी हो रही है, पावर बढ़ता जा रहा है। दुःख चढ़ता जा रहा है। मैंने जीवन को पन्ने पन्ने पलट कर देख लिया हर पन्ने से मेरे हिस्से का जीवन गायब है और कहीं कोई हाथ नहीं जो कह दे 'तुम्हारा मन है इसीलिए करेंगे' मेरे मन की परवाह किसी मन को नहीं। खैर यह मैं चाहता भी नहीं। कोई भावना जो स्वतः स्फूर्ति न हो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। 

जनवरी वैसी ही बीती जैसे मृत्यु के बाद तेरह दिन बीतते हैं, आज फरवरी की पहली तारीख है, इस महीने को लेकर मेरे भीतर कई ख्वाब थे लेकिन यह भी सब ख्वाब ही रहेगा। धीरे धीरे वह दिन आ रहा है जब.... खैर 

मेरा जीवन उस स्त्री की तरह है जिसे मन न होते हुए भी सुख भरे आह की ध्वनि निकालनी है अपने थोपे गए पति के नीचे दबकर इसलिए कि उसके पति का मन है उसके ऊपर कुछ घड़ी हिलकर सो जाने का.. 

लोग चाहते हैं आप उनके सामान्य दुखों पर हफ्तों उन्हें दिलासा देते रहें लेकिन वो आपके गहरे दुःख पर कह दें अरे छोड़ो तो आप छोड़ कर उनके साथ खिखियाने लगो। 


मैं दया पर कुछ नहीं चाहता.. कुछ भी नहीं।  


अंचित अपनी किसी कविता में कहते हैं -  'जो तुम्हारा है वह मेरा नहीं है' मैं इस पंक्ति को महसूस कर गया और यह पाया कि 'मेरा सब कुछ ही तुम्हारा है' स्वयं मैं भी अपना नहीं रहा, मैं अब वही हूँ जो तुम चाहती हो.. लेकिन तुम क्या चाहती हो ? तुम्हारी याद आती रहती है, तुम्हारी देहगंध मुझे रातों को और सुबह पागलों की तरह बिस्तर भर पर रगड़ने को मजबूर कर देती है.. मैं इस रगड़ने में अकेले नहीं रहना चाहता, लेकिन कह नही पाता.. डर लगता है तुम यह न समझ लो की मैं देह भर का हूँ जबकि मैं देह से बहुत भीतर हूँ जहाँ तुम भी देह नहीं हो..जहां देह जैसी कोई चीज़ ही नहीं है। 

मैंने हर जगह होने की कोशिश की..और मैं कहीं नहीं रह गया। मैं इस बरस मर जाना चाहता हूँ।

―  1  फरवरी 26

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