सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

life thoughts लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जिनमें आवाज़ नहीं है

◆ जिनमें आवाज नहीं है उस दिन मैं देर तक सोचता रहा था। आपने गहरे तक प्रभावित किया। इनकी बात से फलां चीज़ को फलां दृष्टिकोण मिला। हम देखते हैं। मेरा भी मन था पर नहीं कर पाया / पायी ।  समय नहीं मिल पाया। समय कम था। जलन। वो उन लोगों के आसपास रहता है वैसा है नहीं। पता नहीं क्या हो गया है। मित्रों। भाइयों बहनों। दोस्त। आपके अलावा कोई नहीं। देशभक्ति। साधु। महाराज।  मुझसे नहीं हो पा रहा है। अन्तोगत्वा। अन्ततः। ऐसे और कुछ शब्द युग्म जिनसे मैं अब भली भांति परिचित हो चुका हूं अब मैं इनके जाल में नहीं फँसता, जहाँ भी यह उपयोग किए जाते हैं मैं समझ जाता हूँ यहां कुछ तो दिक्कत है। विशेषण, अपवाद, और अति शांत तीनों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।  ***********  गुटों, प्रोफेसरों, नेताओं, अफसरों, विभागों, किताबों,  जातियों, धर्मों, के बीच मनुष्य मर गया, हम सब जिसे देख रहें हैं, हाथ मिला रहें हैं, मुस्कुरा रहें हैं, सब किसी न किसी गुट के हैं, किसी न किसी जाति के हैं, किसी न किसी धर्म के हैं, स्वतंत्र कोई नहीं हैं, शोषकों का विरोध करते करते यह सब खुद शोषक बन गए हैं। इन सब से उ...

इच्छाओं का समुच्चय

ऊपरी स्तर पर इच्छाएँ जितनी सुंदर और सपाट दिखती हैं इच्छाओं के तल में उतरने पर वह उतनी ही लिजलिजी और अजीब सी महसूस होती हैं। इच्छाएँ पानी और आग दोनों हैं वो न हों तो भी दिक्कत है हों और सीमा से अधिक हों तो भी दिक्कत है। जब दो लोग जुड़ते हैं तो उनके बीच इच्छाओं का संसार जुड़ता है, आत्मा जुड़ती है तो देह भी जुड़ने का रास्ता खोजती है। मगर क्या हो अगर एक को जो इच्छाएँ सुंदर लगतीं हों अगले को बिल्कुल बेकार ? क्या ऐसा संभव है ? या कोई भीतरी डर है जो हमारे भीतर की स्वाभाविक और मानवीय इच्छाओं पर हावी है ? यह प्रश्न सृष्टि के निर्माण से अभी तक यथावत है और रहेगा कि इच्छाओं का अगर जन्म मन में हो रहा है तो क्यूँ न आदमी उनकी पूर्ति के लिए भागे ? और अगर भाग रहा है तो इसमें गलती किसकी है इच्छाओं की या मनुष्य की ? मुझे इसका कोई ठीक उत्तर सूझता नहीं, हम मनुष्य को गलत ठहराकर इच्छाओं को दोषमुक्त नहीं कर सकते, फाँसी लगा लेने वाले से ज्यादा बड़ा दोषी उसे फाँसी लगा लेने को मजबूर करने वाला है। है कि नहीं ? तो फिर इसका क्या उत्तर हुआ ?  मन ऐसे तमाम सवालों से घिरा रहा। मगर जवाब कोई ऐसा नहीं मिला जिसस...

जलं नदीनां च नृणां च यौवनम्

संस्कृत कवियों ने नायक को चार प्रकार का बताया है। इन चारों प्रकारों में जो पहला प्रकार है जिसे धीरोदात्त नायक कहते हैं उसके अंतर्गत राम आते हैं, दुष्यंत आते हैं, भीष्म आते हैं। यह वो लोग थे जिन्होंने अपने कहे के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। मगर सोचने की बात है आज जब लोग अपनी कही बात को घण्टे भर में पलट दे रहें हैं जब इतने साधन हैं इतनी सुविधा है, जब इतने विचारवान लोग हैं जो बाजारवाद के विरुद्ध लंबे लेख लिखते हैं और फिर उन्हीं लेखों को इकट्ठा करके छापकर बाजार में पुस्तक मेला लगाकर बेचते हैं तो उस समय का सोचकर देखिए जब कल्पित इतिहासकारों के अनुसार जब  भारतीयों के पास कोई ज्ञान नहीं था वो निरे मूर्ख और जंगली थे, खाल ओढ़कर जीते थे कबीले में रहते थे उनके  समाजिक संरचना भी नहीं थी। वह मनुष्य कहलाने लायक मनुष्य तो आक्रमणकारियों के साथ रहने से हुए, सभ्य जो अंग्रेजों से हुए उन असभ्य अमानुषिक लोगों का सोचिए जो अपनी कही बात के लिए मर मिटते थे। और आज के अनगिन और स्वघोषित नायकों का सोचिए जिन्हें इस समय के कवियों ने गढ़ा उनमें कितना अंतर है।  दरअसल मुझे यह सब याद इसलिए आ रहा है क्योंक...