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जलं नदीनां च नृणां च यौवनम्

संस्कृत कवियों ने नायक को चार प्रकार का बताया है। इन चारों प्रकारों में जो पहला प्रकार है जिसे धीरोदात्त नायक कहते हैं उसके अंतर्गत राम आते हैं, दुष्यंत आते हैं, भीष्म आते हैं। यह वो लोग थे जिन्होंने अपने कहे के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। मगर सोचने की बात है आज जब लोग अपनी कही बात को घण्टे भर में पलट दे रहें हैं जब इतने साधन हैं इतनी सुविधा है, जब इतने विचारवान लोग हैं जो बाजारवाद के विरुद्ध लंबे लेख लिखते हैं और फिर उन्हीं लेखों को इकट्ठा करके छापकर बाजार में पुस्तक मेला लगाकर बेचते हैं तो उस समय का सोचकर देखिए जब कल्पित इतिहासकारों के अनुसार जब  भारतीयों के पास कोई ज्ञान नहीं था वो निरे मूर्ख और जंगली थे, खाल ओढ़कर जीते थे कबीले में रहते थे उनके  समाजिक संरचना भी नहीं थी। वह मनुष्य कहलाने लायक मनुष्य तो आक्रमणकारियों के साथ रहने से हुए, सभ्य जो अंग्रेजों से हुए उन असभ्य अमानुषिक लोगों का सोचिए जो अपनी कही बात के लिए मर मिटते थे। और आज के अनगिन और स्वघोषित नायकों का सोचिए जिन्हें इस समय के कवियों ने गढ़ा उनमें कितना अंतर है। 

दरअसल मुझे यह सब याद इसलिए आ रहा है क्योंकि मैं भीतर द्वंद्व से भरा हूँ और महसूस कर पा रहा हूँ कि वादा करना या कोई बात कह देना जितना आसान है उसे जीना बहुत मुश्किल, आजकल तो हम वादों को नए रूप से परिभाषित करते हैं, यानि समयानुकूल हुआ तो निभाया जाता है अन्यथा नहीं, यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैंने इसी महीने के शुरुआत में अपने मन से कहा था भीतर भयंकर तड़प भी उठे तो ज़ाहिर नहीं करना है, चिट्ठी नहीं लिखनी है, हँसते रहना है, मगर मुझसे न हो सका। मैंने वही किया जो मैं नहीं चाहता था करूँ, चिट्ठी लिखी, आसूँ बहाए और कहा कि.......... 

मैं इतना कमजोर क्यूँ हूँ आख़िर... अकेले क्यूँ नहीं रहा जाता मुझसे ? 


मैं अपने मन का दोषी हूँ या किसी और का, पता नहीं। मैं अपने को अनगिन तर्क देकर समझा तो रहा हूँ मगर भीतर ग्लानि भरती जा रही है। मन यह स्वीकार क्यूँ नहीं करता की उसे वही स्वीकार करना है जिससे वह भाग रहा है। मेरी नाल यहीं गड़ी है मैं अलग अलग जगहों की तस्वीरें देखकर वहाँ होने की अनुभूति कर सकता हूँ। जहाँ होना चाहता हूँ वहां हो नहीं सकता। अभी उसका समय नहीं है। फिर भीतर से यह लालसा खत्म क्यूँ नहीं होती ? ऐसी लालसाएं तब और भभक पड़ती हैं जब उनमें कुछ विशेष वाक्यों को आशा नाम अग्नि में पकी घी के साथ आहुति दी जाती है।  हम यह क्यूँ नहीं समझ पाते कि हमारे दुःखी होने से, हमारे तड़पने से किसी की तमाम दिनचर्या प्रभावित होती है, उसका संघर्ष जटिल होता है। हमारे भीतर नायकों के कोई गुण क्यूँ नहीं आ रहे हैं और कुछ नहीं आए हम धीरज तो धरना सीख जाएं, समय को स्वीकार करना सीख जाएँ यही बहुत हो। अच्छा स्वीकार कर लेने से टीस कम हो जाती है क्या ? अगर ऐसा है तो मैं अपने को मृत स्वीकार कर लूँ तो क्या मेरे भीतर की समस्त इच्छाएँ भी मर जाएंगी ? काश ये हो पाता। हम इस जमाने में इतना करने योग्य होते काश तो हर दिन नयी मौत मरते और भीतर की कमी को मारकर नए बनते। 

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हम सम्बन्धों की जीवंतता बनाए रखने के लिए एफर्ट नहीं करते हैं, कम से कम वैसा तो नहीं करते हैं जिससे एफर्ट शब्द की लाज बची रहे। काश हमें यह हमेशा याद रहता कि जीवन की विषम और सुखद दोनों परिस्थितियों की अनुभूति आनंद से भरी होती है तो हम कितने खुशहाल रहते। आज जिन चीजों के लिए तड़फ रहें हैं जब वह जीने का अवसर आएगा तो वह सुख इतना छुद्र लगेगा कि हम यही इसी दिन में लौटकर आएंगे और यहाँ से मन को ज़बरन वहाँ ले जाने का प्रयास करेंगे जो फिर तो नहीं ही जाएगा। 

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समझने और समझाने से परे कभी कभी हम बस सुने जाने की इच्छा से भरे होते हैं। 

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पिताजी अब तक घर थे मन आश्वस्त था। कल वो चले गए, मुझे माँ की आँखें याद आ रही हैं। और वह क्षण भी जब मैं पापा को चौराहे पर बस के लिए उतारकर पैर छूकर मुड़ता हूँ, वो मेरा सिर सहला कर ऐसे कहते हैं 'जाओ घर जाओ भईया' जैसे मैं अभी अभी उनकी पत्नी के गर्भ से निकला हूँ और वो मुझे देख रहे हों... पहली बार उन्होंने जब मुझे देखा होगा तो क्या महसूस किया होगा, काश मैं वह महसूस पाता आज.. 

वो मुझे देखते रहते हैं जब तक मैं तमसा पुल पार नहीं हो जाता.. मैंने कई बार मुड़कर देखा है, वो बिना चश्मे के मुझे देख लेते हैं, दूर से भी पास से भी..

अनुपस्थिति को स्वीकार करने की हिम्मत कब आएगी मेरे भीतर ? 


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देंह की आवश्यकता संभोग नहीं एक स्नेहिल आलिंगन है, अधिकार भरा स्पर्श है, जो हमें देह जैसी भावना और शर्म जैसी रूढ़ी से बाहर खींच सके और हम एक दूसरे में इस कदर रम सकें की भूल जाएं हम कुछ घड़ी पहले तक देंह थे। 


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प्रेमी के पसीने में भी महक होती है

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हम सहेजने का मूल अर्थ प्रेम करने के बाद समझ पाते हैं। फिर हम कंघी में फंसे बाल, शर्ट में बसी महक, किसी की छुई हुई चीजों को सहेजते हैं। किसी के आसपास होने का मूल अर्थ समझ पाते हैं और भीतर देर तक काँपते रहते हैं

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सबसे सुंदर रिश्ता वह हैं जिस रिश्ते में आपको हर संवाद के बाद लगे यह तो नया रूप है पर आप अपनी रुचि अनुरूप उस व्यक्ति को बनाएं बिगाड़े नहीं उसे स्वीकार करें वैसे जैसे वो है।  

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मुझे हमेशा लगता है जैसा मैं उसका बेटा हूँ वह मेरी जननी, मुझे उसकी याद ऐसे ही आती हैं जैसे नवजात बच्चों को अपने माँ की..

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कई योजनाओं को यात्राओं को इस साल के लिए भी स्थगित ही मानता हूँ, महादेव क्षमा करना। ख़ैर तुमसे क्या माफ़ी माँगना तुम्हीं तो कर रहे हो सब.. सब ठीक कीजिए कि हम आ सकें। कृपया मेरे भीतर से यह व्याकुलता खत्म कीजिए, मेरे चित्त को समझाए उसे यहीं रहना है, लड़ना है। 

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उसके पाँव देखे कल...तबसे बार बार देख रहा हूँ। काश! मैं अपना होंठ रख पाता उसपर..

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सच ही कहा है अश्वघोष ने ; 

ऋतुर्व्यतीतः परिवर्तते पुनः 

क्षयं प्रयातः पुनरेति चन्द्रमाः ।

गतं गतं नैव तु सन्निवर्तते 

जलं नदीनां च नृणां च यौवनम् ॥


और तो सब ठीक ही है... 


― आशुतोष प्रसिद्ध 

4: 15 शाम / 15 जनवरी 2025


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