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रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान

सतत प्रयास करके भी बहुत सारी रूढ़ियों को ख़त्म नहीं कर पा रहा हूँ, मैं जितने दिन रहकर उस पनपते कँटीले पेड़ को काटता हूँ , जैसे छोड़ता हूँ वह उससे दोगुनी जगह घेर लेता है और अधिक हरा भरा हो जाता है, इसको पोषण देतीं हैं हमारी बुढ़िया संस्कृति जिसका अपना हर अंग बेकाम हो गया है। मैं जबसे जानकार हुआ हूँ लगातार यह प्रयास करता रहा की मैं पहले वह परिर्वतन अपने घर में लाऊं जो बाहर बोलना चाहता हूँ पर मैं हर बार फेल ही हुआ, सोचता था परिवार में किसी शादी में दहेज नहीं लेने दूँगा, बड़े भाईयों की शादी में उनके पिताओं ने लिया, बहनों की शादी में हमारे पिता ने दिया। बहनों पर कभी किसी प्रकार की पाबंदी नहीं रही, वो पढ़ी लिखी, मेहनत की पर अभी कहीं जॉब नहीं कर रहीं हैं, प्रयासरत हैं, पर जब उनको चली आ रही जीवन शैली में रमी देखता हूँ मुझके कुढ़न होती हैं, उस शिक्षा का मतलब समझ ही नहीं आता मुझे, पुरूष भी वैसे ही हैं उन्होंने पढ़ाई ख़ूब की डिग्री ख़ूब है पर शिक्षित नहीं है, वो अभी उसी आँख से दुनिया देखते हैं जो आज से 2 हज़ार साल पहले वो साधू संत लिखकर गए थे जो खुद दृढ़प्रतिज्ञ नहीं थे एक अप्सरा की पुकार पर अपना ध्यान भूल जाते थे, जो न कभी एकनिष्ठ थे, जिन्होंने समाज को वर्गों में बांटा, हमें इन चीजों से ऊपर उठना पड़ेगा, पुराने घर से प्रेम करना अच्छी बात है पर जब वो टपकने लगे उसकी दीवार जर्जर हो जाये तो उसे घिरा कर नया खड़ा करना भी जरूरी होता है अन्यथा वो खुद ढहेगा सब को ले डूबेगा। रूढ़ी की जड़ किस हद तक है आप इससे सोच सकते हैं कि मैं माँ के अस्वस्थ होने पर चाय बना देता हूँ खाना बना देता हूँ तो माँ को अपने ऊपर ग्लानि होती है, वो यह नहीं कहती कि चलो अच्छा है हमारी बहु ख़ुश रहेगी उसके साथ तुम होगे, कहती है इसीलिए कह रहा शादी कर लो तुम बाहर भी काम करो खेत बाड़ी बाजार भी देखो यहाँ भी..बहू रहेगी तो आराम तो मिलेगा कुछ। मैं जैसे ही कह देता हूँ मैं बहुत सामान्य शादी करूँगा, बिल्कुल अपने परिवार के साथ बस, तो कहती हैं समाज क्या कहेगा.. ये समाज का कहना कब बन्द होगा..

मैं इस भंवर से बचाकर निकाल लेना चाहता हूँ सबको..मगर कैसे..

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जीवन के तमाम संघर्ष तब शूल की तरह चुभते नहीं जब उन्हें कुरेदने वाला नहीं उनपर मलहम लगाने वाला कोई हो, जीवन कहीं भी असुंदर नहीं है, अगर अपने मन के लोगों का साथ हो, खुशी आलीशान घर , बड़ी गाड़ी, सुंदर कपड़ों में नहीं है, सुख अपनों के साथ में है वह बना रहे बस। 

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मैं अपनी ज़िद पूरी करूँगा कैसे भी..बने बनाए ढाँचे से लड़ जाना पड़ेगा लड़ूंगा, नहीं जाऊँगा, दृढ़प्रतिज्ञ मन से किसी को भी हिलाया जा सकता है। मैं एक जगह खड़े होकर प्रतीक्षा करूँगा.. समय की सुई कभी तो मेरे तरफ आएगी। आएगी ही..आना ही पड़ेगा उसे। 

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बीज कभी भी ठण्ड में अंकुर नहीं फोड़ते उन्हें गर्मी चाहिए होती है, उन्हें बाहर नहीं मिलता तो अपने भीतर को इतना सिकोड़ लेते हैं कि उस सिकुड़न की गर्मी से अंकुर फुट पड़ता है। सृजन कभी अपने भीतर गए बिना नहीं हो सकता, अच्छी कृतियां हमेशा अभावग्रस्त व्यक्तियों ने लिखी कारण यही है उनपर हर जगह से दबाब था उनके भीतर के अंकुर को फूटने के लिए सुंदर माहौल मिला। रचनात्मक व्यक्ति इसीलिए कभी भी बहुत उत्साही खुशमिजाज किस्म का नहीं होता। वह हमेशा एक दबाव में रहता है। वही दबाव उसका वातावरण है उगने का, बनने का। 

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प्रेम में ही हम अपने को द्वितीयक मानने को तैयार होते हैं अन्यथा नहीं, प्रेम में ही इतनी ताकत है कि वह किसी को भी झुका दे, पत्थर को रूला दे और किसी में नहीं.. प्रेम में एक अजनबी सी महक है जो बनी रहती है, प्रेमी की स्मृति भर से आप उस महक से भर जाते हैं वही महक जीवन है उसे बचाए रख पाना जीवन का हासिल और जीवन की साधना भी.. मैं साधना में हूँ।


- 18 जनवरी 2025 / शाम 7 बजे

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