एक हद तक हम ख़ुद को रोकते हैं, लगातार रोकते हैं, फिर जब लगता है कि अब नहीं हो पाएगा, अब नहीं कहा तो हृदय नहीं उठा पाएगा भार तो फूट पड़ते हैं जैसे अचानक मिट्टी खोदते खोदते फुट पड़ता है पानी, हम पसर जाते हैं, ऐसी स्तिथि में हम किसी आकर में नहीं होते किसी रूप रंग में भी नहीं होते , हम बस होते हैं.. बिल्कुल बनावट से अलग साफ सच्चे आदम की तरह..अब जिसकी कल्पना भी फैंटसी है।
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खुद को किसी को सौंप देने के बाद फिर यह कैसे जानें कि कितना हमें खुद को बचाए रखना है कि ख़ुद को भूलें न हम। क्या यह ईमानदारी है ? अच्छा ये ईमानदारी है क्या ?
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पत्थर किसी भावुक और अति संवेदनशील व्यक्ति का चेहरा है जिसकी आँख से आँसू सुख चुका है।
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मैं अपनी आंख अपना मन बदलना चाहता हूँ.. क्या भ्रमण से भरम दूर होते हैं ? मुझे यहाँ से जाना है कहीं मैं ऊब गया हूँ
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उम्मीद तहों में टूटती है, हमें परछाई दिखने लगती है पर हम स्वीकार नही करते , जब स्वीकार करने की स्थिति में होते हैं तब तक उम्मीद नयी उम्मीद से जुड़ जाती है।
― 26 जनवरी 2025 / 11 बजे रात
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