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अ-धार्मिक लोगों की धार्मिक भीड़

हम अपना हृदय शब्दों के सहयोग से दर्पण की तरह खोलकर रख देते हैं, वो हूबहू तो नहीं मगर मन के आसपास तक पहुँचता हुआ लगता है, जिससे कहना है उसे कह देते हैं, फिर जब वो उन पीड़ाओं से दुःखी हो उठता है तो भीतर से ग्लानि पनपती है, अपने ही ऊपर क्रोध फूटता है, मन कितना अजीब होता है न ? वह चाहता है कि उसका प्रिय यह भी जाने उसके पीछे छूटा व्यक्ति उसे कैसे याद कर रहा है उसकी अनुपस्थिति को कैसे जी रहा है, उल्टा यह भी चाहता है कि उसका प्रिय हमेशा हँसता रहे उसे तनिक भी दुःख न हो, दुःख शब्द का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए उसके जीवन से..पर यह दुःख है की वह हमेशा किसी न किसी के सहारे चिपका रहता है, दुःख परजीवी है, वह अपने जीवन के लिए हमारा जीवन खाता है धीरे धीरे हम रोते है तो आँसू वही पीता है और बढ़ता रहता भीतर.. ऐसे लोग कितने किस्मत वाले हैं जिनके लिए कहीं कोई राह देख रहा है, जिनके लिए कोई मन सोच रहा है, वो कैसे होंगे जिन्हें कोई सोचता ही नहीं होगा, ऐसे लोग तो होंगे ही न जीवन में ? मन को मनभर कह जाने के बाद लगता है क्या मैं ही इतना सोचता हूँ, इतनी भावनाओं का जवाब केवल चुप्पी कैसे हो सकती है? बोल जाने के बाद लगता है न बोलना बेहतर था, फिर कुछ क्षण बाद लगता है नहीं बोलता तो करता क्या उन भावनाओं का.. भावनाएं छिपाना भावनात्मक धोखा है अपने प्रिय के साथ, क्यूँ ? है न ? है ही। 

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कई बार हम बात से ज्यादा व्यवहार से टूट जाते हैं


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सुख हमेशा एक पक्षीय होता है, जब एक पक्ष ख़ुश होगा तो अगला दुःखी, दोनों साथ साथ ख़ुश नहीं हो सकते, कोई न कोई विछोह का दर्द जियेगा और कोई संयोग का सुख, आज बड़ी बहन के घर गया था, माँ ख़ुश थी कि उनकी बिटिया आएगी , दीदी की सांस इस बात से दुःखी थी कि उनकी बहु जा रही है अब वो कैसे रहेंगी, उन्हें देखना उनकी शक्ल को ख़ुद को स्टेशन पर खड़े देखना था, जैसे मैं हर बार स्टेशन पर खड़े हो उसे विदा लेते देखता हूँ वह कहती है देखो परेशान न हो..पर मैं तो उर्मिला हूँ न जो अपने प्रिय से दूर रहकर आँसू न बहाऊँ, अन्ततः हमारे हाथ में बचता क्या है.. इतना कहना कि अपना ख़्याल रखना और जाती हुई ट्रेन को देखकर निरीह सा खड़े रहना। 


मैं उन्हें रोते देख रहा था और रो रहा था, एक महिला काँप रही थी और एक बार बार फोन करके पूछ रही है कहाँ पहुँचे, इंतज़ार दोनों तरफ है मगर अब यह कैसे तय हो कि कौन ज्यादा दुःखी है, जो दो महीनों से साथ है या जो 30 साल से ..जानता हूँ दुःख की तुलना नहीं होती, करनी भी नहीं चाहिए, यह क्रूरता है। मगर मन में सवाल उठता है न कि जीवन ऐसा क्यूँ है ? हम सबको समेटकर साथ क्यूँ नहीं रह सकते ? उसने कहा.. लड़कियों के साथ यह जीवन भर का द्वंद्व रहता है' उन्हें दोनों चाहिए मगर उन्हें एक समय पर एक ही मिल सकता है, मन को बस यह दिलासा देना पड़ता है कि वो जहाँ है ख़ुश है बस बहुत है, 


मैं दोपहर से यही सब सोच रहा हूँ , मैं जिसे अपने पास रखना चाहता हूँ उसे मैं एक पक्ष से दूर ही तो करूँगा, भारतीय समाज ऐसा है कि वहाँ दोनों परिवार को साथ कर ले जाना बड़ा मुश्किल है.. सही कहा उसने.. 'सब साथ कभी नहीं रह पाते कोई न कोई तो छूटता ही है' 


मन यह सब सोच लेता है तो जैसे बैठ जाता है, हम कितने भरम में जीते हैं कि हम... 


ख़ैर ! 

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मुझे लोग पागल समझते होंगे कि इतना कौन सोचता है, कौन इतना याद करता है, कौन इतना तारीखों और दिनों को याद रखता है.. कौन बातों का टोन पकड़ लेता है कि क्या और किस भाव से बोला जा रहा है.. कभी कभी मैं यह भी सोचता हूँ क्या वह मैं ही हूँ जो मैं हूँ फिर संदेह से भर जाता हूँ।

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किसी की याद आती हो तो उसे रोकें कैसे ? क्या याद पर पहरा लगाया जा सकता है ? 


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शहर जाम से पटा पड़ा है, सांस लेना मुश्किल हो गया है, गाड़ियां सड़को पर रेंग रहीं हैं, लोग एक पर एक चढ़े जा रहें हैं, इतना नशा है धर्मिक होने का की कोई चलने की रफ्तार कम कर दे तो उसे राह बना दिया जा रहा है कुचल कर.. यह अधार्मिक लोगों की धार्मिक भीड़ है। लोग पत्थरों में प्राण खोज रहें हैं और प्राण को पत्थर मार रहें हैं। सरकार कितना भी योजना बद्ध काम कर ले कितनी सड़कें बनवा दे कितनी बस और ट्रेन चलवा दे जब लोग गैरजिम्मेदार और निरा अमानुषिक और आँख होते हुए अंधे हों तो उनका कुछ नहीं हो सकता...

आज अयोध्या में 4 मौतें हुईं भीड़ की वजह से कितने लोग बेहोश हुए, कितने मरीज जाम में फसें मर गए ,कितनी लाशों को मरने के बाद भी सुकून नहीं मिला..लेकिन धर्म हुआ, 6 लाख से दर्शन किया, युग का महान काम हुआ। 

यह धर्मिक दिखने का नशा जल्द उतरेगा ऐसा उतरेगा की भरोसा नहीं होगा किसी को कि यह वही भारत है.. मैं शायद न रहूँ जो रहेंगे देखेंगे।

मन ..

― 27 जनवरी 2025 / 6 बजे शाम 

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