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कोई कहीं से पुकारे मुझे

मुझे न जाने क्यूँ किस बात पर क्रोध आ जाता है मैं जान ही नहीं पाता। यह सुनने में कितना अजीब है मगर सच है। सच बताऊं तो मैं समझ नहीं पाता मैं क्रोध में होता हूँ या दुःख में. पर यह अचानक होता है मैं अपने को बेकार से महसूस करता हूँ। क्यूँ ? पता नहीं । 


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परिवार में सब खुशहाल हैं, जो जहाँ हैं अपने ढंग से संक्रांति मना रहें हैं, कोई सरयू में नहा रहा है कोई नर्मदा में तो कोई कई नदियों में एक साथ, सबके चेहरों पर प्रसन्नता है। मन उल्लास से भरा है।  कोई चूड़ा दही खा रहा है कोई उड़द की खिचड़ी, मैं हर जगह थोड़ा थोड़ा हूँ और कहीं नहीं हूँ। त्योहार बड़े जरूरी हैं रुचियाँ स्पष्ट होती हैं, मन खुलता है। 

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कहीं होते हुए कहीं और होने की इच्छा हमें कहीं का नहीं रहने देती। 

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हम कुछ लोगों के सपने में आते हैं, और कुछ लोगों का कोई सपना हमारे बिना पूरा नहीं होता, जीवन में ऐसे लोगों के पास रहिए जिनके सपने आपके बिना पूरे न होते हों। 

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मैं कुछ दिनों के लिए पहाड़ पर रहना चाहता हूँ, यहाँ की सभी सुख सुविधाओं को छोड़कर दो जोड़ी धोती पेटभरने भर के अनाज, कुछ किताबों सादे पन्नों और कलम के साथ...

मैं अपने भीतर से अपने को निकाल कर देखना चाहता हूँ उसमें कितना कीचड़ है। कितना धुलने पर साफ होगा, या जला ही देना पड़ेगा। 

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.           2021 में किसी दोपहर की तस्वीर  

आज पुल से नीचे देख रहा था, मुझे कोरोना की दूसरी लहर के दिन याद आ रहे थे, यहाँ लाशों का अंबार लगा था, रेत में ऊपर ही ऊपर तोप दी गई लाशें, राम नामी गमछों, सफ़ेद मारकीन के कपड़ों, पारदर्शी पन्नियों, कम्बलों और कपडों से लगभग सैकड़ों हेक्टेयर क्षेत्र से भरा था, मैं कई रात वहाँ घूमा हूँ, अब वहाँ आयोजन हो रहा है, यहीं लोग रोते बिलखते थे, हज़ारों ने देखा भी नहीं उनके परिजन कहाँ किस हाल में दफनाए गए, आजकल यहाँ जीवन बसा हुआ है। भीड़ ही भीड़ है। ख़ूब कल्पवासी हैं। अनगिन दुकानें जीवन ही जीवन भरा है। संसार ऐसे ही  व्यतिक्रमों में चलता है, बढ़ता है, और ख़त्म हो जाता है। 

हम सब किसी न किसी लाश पर खड़े हैं, रह रहें हैं, जी खा रहें हैं। यह सम्पूर्ण पृथ्वी कितने मृतकों से पटी होगी हम कल्पना भी नहीं कर सकते.. 




       तस्वीर– नीतीश भईया की फेसबुक वॉल से 

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अम्बर पांडेय का उपन्यास ' मतलब हिन्दू' शुरू किया हूँ। इससे पहले 'निस्सहाय हिन्दू' और 'आदर्श हिन्दू' ही पढ़ा था।  इनमें आदर्श हिन्दू तो आत्मकथा जैसी थी, थोड़ी उबाऊ और बोझिल थी। निस्सहाय हिन्दू , मुस्लिम कट्टरता का चित्रण करती है। मतलब हिन्दू के विषय में अभी कुछ कह नहीं सकता जितना पढ़ा हूँ लग रहा है द्विवेदी जी का उपन्यास पुनर्नवा नवीन रूप में पढ़ रहा हूँ। भाषा अच्छी है।

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ईश्वर भले कुछ दे न दे पर परिवार से दूरी और अकेले होने का दण्ड न दे, दो पांवों से दस जगह दौड़ना है एक मन से कई मन का सोचना है। 

ख़ैर .. ठीक है सब 

― आशुतोष प्रसिद्ध 

दोपहर 3: 20 / 14 जनवरी 2025 


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