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जीवन राह


हम सब उम्मीद से ज्यादा किसी टीस के सहारे ज़िंदा हैं। टीस शायद ठीक शब्द होगा, अगर हम इसे खीझ कहें तो कोई ग़लत नहीं होगा। हॉं खीझ..खीझ ही हमें बचाए हुए है। समय से कुछ न हो पाने की खीझ, किसी से दूर रहने की खीझ, मन का जीवन न जी पाने की खीझ में हम जीवन को रगड़ा देकर जी रहें हैं। हम जीवन में जो कुछ तनिक  या हल्के मार्जिन से चूक गए उसके लिए जीवन से भारी शुल्क उसूल रहें हैं। हमारी जीवन शैली ऐसी है कि जीवन भी अब जीवन रूप में आने से डरने लगा है। 

कल की रात नींद नहीं आ रही थी, कुछ घड़ी फोन  देखता रहा, कुछ घड़ी दीवार और पंखे की गंदी पत्ती। कुछ पुरानी तस्वीरों और वॉइस नोट्स से उन दिनों में लौटा, जिन दिनों को सोच लेने पर अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं होता.. छाया मत छुना मत का एक पुराना रिकॉर्ड सुना, अखरावट के कुछ पद पढ़े। सुबह को नींद आई। नींद लाने के लिए बड़े जतन करने पड़ते हैं। अजीब है, जागने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। दिन कई करवटों में बीता। सम्भवतः रात भी ऐसे ही बीते। हम कभी कभी बीते दिनों की गंदगी साफ करने में आने वाले दिन को बर्बाद कर लेते हैं। 

इन दिनों घूम फिर कर राजन जी महाराज के भजन और जगजीत सिंह जी के ग़ज़ल पर अटका हूँ। सुख जैसा कुछ मिलता है। अपने को भूलकर जीने का दो ही तरीका है, या तो प्रेम में रहो या संगीत की संगत में।

मनुष्य बड़ा पापी जीव है, पापी ठीक शब्द है ? शायद, पर अभी मन यही कह रहा है। उसने जीभ और दिमाग का इस्तेमाल बस पलटने और बदलने में ज्यादा किया बनिस्बत उसके जो उसका मुख्य काम था। वह अपनी ही कही बात से टल जाता है। मैं भी .... अजीब सा हुआ है सब। प्रायश्चित होश में की गलतियों के लिए नहीं होता, और गलतियां कभी बेहोशी में नहीं होती हैं। मन कर रहा है दोनों हाथों से अपना मुँह पीट लूँ।

हद है ! क्यूँ ऐसा जीवन है ? क्या जीवन भी अपने किसी जीवन की खीझ निकाल रहा है मेरे इस जीवन से..

सब कुछ लिख देना, या किसी ने कहना कि मैं तुमसे झूठ नहीं कहना चाहता, ज़िम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लेना तो नहीं है ? अगर है तो कितना क्रूर है यह 

ख़ैर.. 'होगी जय होगी जय हे पुरूषोत्तम नवीन' 

काश मैं भी शमशेर की तरह निराला के लिए कह पाता तो यही कहता। 

' भूल कर जब राह—जब जब राह... भटका मैं

तुम्हीं झलके, हे महाकवि,

सघन तम की आँख बन मेरे लिए,

अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वास बन मेरे लिए—

जगत के उन्माद का

परिचय लिए,

ओर आगत-प्राण का संचय लिए, 

झलके प्रमन तुम.....

मगर .. बहुत कुछ जो मैं कहना चाहता हूँ मुझसे पहले बहुतों ने कह दिया है।

― आशुतोष प्रसिद्ध 

13 जनवरी 2025 शाम 7 बजे 


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