हम सब अपनी अपनी ज़मीन पर लड़ रहें हैं। हमारे संघर्ष हमारे अलावा कोई नहीं देखता। देखना भी नहीं चाहिए अन्यथा हम एक दूसरे से प्रेमभाव कम दयाभाव अधिक रखेंगे। दया और प्रेम में अंतर है बहुत बड़ा अंतर ।
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सबसे गहरी रुलाई हम बिना आसूँ बहाए रोते हैं।
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इतने आदमी हैं फिर भी हर आदमी अकेला है। क्यूँ ?
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नींद न आने की भी एक सीमा होती है, हम अपनी मन की जगह पाते ही छोटे बच्चों की तरह सोते हैं। फिर वो नींद कुछ पल की ही क्यूँ न हो पूरी लगती है।
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इन दिनों अश्वघोष को पढ़ रहा हूँ, बुद्ध को समझ रहा हूँ, और बार बार महसूस रहा हूँ कि परिवारिक जीवन जीना है तो साधू संतों से दूर रहना चाहिए, और साधू संतों के पास रहना है तो परिवारिक जीवन से.. दोनों एक साथ सम्भव नही। दोनों साधने में हम कई जिंदगी बर्बाद करते हैं।
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जीवन जीना पग पग पर समझौता करना है, अपने प्रिय व्यक्ति से दूर रहना है। ऐसे जीवन मुझे नहीं जीना। मैं अब मर जाना चाहता हूँ...
काश! यह डायरी का आख़िरी पन्ना होता। तो मैं इसमें लिखता मैं बहुत खुश हूँ। इतना ख़ुश की नहीं चाहता की कोई ऐसा खुशहाल जीवन जिए।
― आशुतोष प्रसिद्ध
16 जनवरी 2025 / शाम 7 बजे
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