यह बिन सिर पैर की बात है क्योंकि इस बात का सिर और पैर तर्क से देखा नहीं जा सकता। यह भावनात्मक अनुभूति है जो यूँ ही छोटी बहन से संवाद करते हुए एक वाक्य के श्रवण मात्र से मेरे भीतर उपजी, भीतर जैसे कुछ कौंधा मैं देर तक सोचता रहा उस वाक्य को, देर तक सोचने के बाद मुझे महसूस हुआ कि ऐसे वाक्य परिवार में ही बोले सुने जा सकते हैं।
क्या कभी किसी ने आपसे बोला की वह आपको अकेले छोड़कर नहीं जाएगा ? नहीं बोला होगा ! मुझसे नहीं बोला किसी ने मैं हर जगह अकेला छूट जाता हूँ। घर परिवार में, रिश्ते में, दोस्तों में, अपने में भी.. क्यूँ ? पता नहीं। शायद मैं सबके साथ होने का प्रयास करता रहता हूँ इसीलिए।
'प्रीति रहै इकतार' इसे फिर पढ़िए, पढ़ा ? अब बताइए कुछ समझ आया ? नहीं आया तो फिर पढ़िए, हर चीज व्याख्यायित नहीं की जा सकती है। यह कबीर के एक दोहे के द्वितीय चरण में उपयुक्त वाक्य है, और बताऊँ तो इसमें ग्यारह मात्रा है, और 9 अक्षर, बताया और भी जा सकता है मगर अब नहीं, यह मुझे कबीर ग्रंथावली पलटते हुए मिला। ऊपर कही कुल बात का सार यही तीन शब्द से मिलकर बने वाक्य में है। अब फिर से पढ़िए, अब खुलेगा।
दिन मशीनी सा बीता। एक महक ओढ़े देर तक लेटा रहा। मन की एक कमज़ोरी को छोड़ दिया। कई कविताएँ जो महीनों से अधूरी हैं उन्हें फिर फिर से पढ़ा। एक कविता की आज तारीख़ देखी वह 6 साल से अधूरी है। पूरी होगी कभी। जीविका के प्रश्न भी तो सालों से अधूरे हैं उन्हें इस साल पूरे करने है। ख़ैर.. मैं यहाँ नहीं जाना चाहता।
किसी कवि या लेखक का सब पढ़ जाने के बाद महसूस होता है यह सब जो कुछ कहा गया यह सब बस एक स्त्री के बारे में है, वैसे ही जैसे आप यह सब पढ़कर बहुत कुछ महसूस करेंगे, मगर यह सब बस उस एक स्त्री के बारे में है। कई बार लगता है सच है वह कल्पना जिसमें शिव और शक्ति हैं, जिसमें आदम और हव्वा हैं, जिसमें मनु और श्रद्धा हैं। यह सब कुछ एक स्त्री के बारे में है। यह सब कुछ एक स्त्री से है।
दिन में और भी बहुत कुछ हुआ मगर कहने योग्य नहीं। दिन इतना ही था।
― आशुतोष प्रसिद्ध
डायरी
शाम 9 बजे / 8 जनवरी 2025
* तस्वीर - पिंटरेस्ट से
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें