ऊब . ऊब.. और बस ऊब
दो चार पन्ने पलटे, भीतर अजीब सी मायूसी छाई रही
एक याद है जो आती ही रहती है.. कमी भरती ही नहीं
रह रहकर आँख भरती है, स्वेटर की कोर से आँख रगड़कर पोंछ लेता हूँ।
कई बार कुछ कुछ चीजों से हटने पर समझ आता है आपका होना न होना वहां किसी गिनती का था भी नहीं। हम ऐसी ही जगहो पर क्यूँ होते हैं ?
आदमी .....
कुछ नहीं, सब ठीक है ।
19 जनवरी 2025/ रात10 बजे
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