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याद नहीं रहने की याद

अपने को भूलकर ही अपनों के बीच जिया जा सकता है। मैं जानता हूँ इस वाक्य के बाद आपके पास कई तर्क होंगे, जैसे सबसे सस्ता वाला होगा कि अपने जो होंगे वो आपको भूलने ही नहीं देंगे की आप क्या हैं, पर मेरा भरोसा कीजिए आप एक दिन इसी वाक्य के साथ सबसे बुरी तरह परास्त होंगे उस दिन आपको यह आभास होगा कि हर दूसरा व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के साथ मस्त है, आप की अनुपस्थिति कहीं खटक नहीं रही है, हर व्यक्ति की अनुपस्थिति को भरने के लिए कोई न कोई उपस्थित है। दरअसल मामला सबसे सरल यह है कि आप समझें जिसके जीवन में बहुत करीबी हैं, उसके लिए कोई भी करीबी नहीं है, सब एक निमित्त मात्र हैं, जब जो जरूरत होगी वह करीबी होगा, फिर उस करीबी के जीवन में क्या चल रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता... कई उदाहरण हैं  मगर ख़ैर छोड़िए.. ************ जबसे जन्म हुआ है, जीवन यहीं जन्मभूमि से 150 किलोमीटर के दायरे में सिमट गया है। कभी कहीं बाहर गया भी तो मजबूरन या परीक्षा के सिलसिले में, बाहर जाने का मन करता रहा पर मन ही बाहर गया मैं न अभी हरिद्वार जा सका, न उज्जैन, न दक्षिण में कहीं जा पाया , न मध्य में, न पूर्व में ही कहीं, केदारन...

बँटा हुआ है मेरा जीवन, बावन खण्डों में कटा हुआ

बिस्तर छोड़कर जब बाहर निकला तो चारों ओर गहरा धुन्ध छाया हुआ था, मन हुआ लौटकर फिर बिस्तर में ही पड़ा रहूँ। मगर चार नए जीवन की बालसुलभ शैतानी ने रोक लिया, तीन छोटे छोटे पिल्ले हैं उन्हें सुबह अधिक दुलार आता है, देखते ही आसपास पूँछ मटकाते हुए दौड़ते हैं, आगे के दोनों पाँव पटककर खेलते हैं, बिल्कुल छोटे टैडीबियर की तरह है गोल मटोल मुलायम से बिल्कुल, इनकी माँ ने इन्हें इस बार बहुत सम्भाल कर रखा था, दो महीने वो उस जगह से निकल नहीं पाए जहाँ उन्हें जन्म दिया था। अब वो निकलते हैं। टहलते हैं। मम्मी को देख लेते हैं तो जैसे खुशी से पागल हो जाते हैं उनके आसपास ऐसे उठते गिरते हैं की देखते बनता, उनकी साड़ी की कोर खींचते हैं, मनभर खेलते हैं, और एक हमारे हीरो हैं सोना के अकेले दीपक, बड़ी बड़ी आँख और कान लिए अपनी माँ का दूध पी लेने के बाद पूरे अहाते में ऐसे कुलांचे भरते हैं जैसे वो गाय के नहीं घोड़ी के बच्चे हों.. जानवरों के बच्चें हों आदमी के बच्चे हों या ख़ुद आदमी ही हों ये सुबह अधिक प्रेम से भरे होते हैं। इनकी स्फूर्ति नए ढंग से नए रंग रूप में दिखती है। मैं हर शाम जो होता हूँ, सुबह वह कभी नहीं होत...