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मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर

कभी कभी मन में यह भाव क्यूँ आता है कि चलो हम कुछ दिन वह सब छोड़कर देखते हैं, वह सब जो हम निरंतर करते हैं अपने आसपास के लोगों के लिए। हम पहल करना रोकते हैं, हम संवाद रोकते हैं, हम हमेशा खड़े रहने की प्रवृत्ति को रोकते हैं, हाल चाल लेते रहने की आदत को रोकते हैं, रोकते हैं कि हमारे रोकने के बाद कौन हमसे पूछता है कौन पहले पहल करता है कौन उस समय पर आकर कहता है 'अरे आप नहीं आए तो हम चले आए'  क्यूँ आता है यह विचार ? जबकि यह तय है कि पलटकर कोई नहीं करने वाला पहल, सबकी अपनी व्यस्तता है, सबकी अपनी प्राथमिकता आप हँस कर कह देंगे तो जवाब भी आप पर ही लादकर दिया जाएगा। कारण क्या है इसका ? ऐसे सम्बन्धों का अर्थ क्या है ? सच में जानना यह चाहता हूँ ऐसे लोगों पर भावनाओं को ख़र्चने का क्या अर्थ ?   जब दो जीवन के बीच वैसा चुम्बकत्व न हो जैसे होना चाहिए तो अपने जीवन को दूसरे जीवन से किनारे कर लेना ही उचित होता है। एकतरफा एफर्ट करता व्यक्ति हमेशा हृदयाघात से मरता है। यह सामान्यीकरण नहीं है, बस विचार है जिसे लक्षणा में समझने की जरूरत है।  ************ दिन ब दिन लिखे जा रहे साहित्यि...