साँस रुकने से पहले पहले, सारी राह चल लेना चाहता हूँ, सारी दुनिया एक बार देख लेना चाहता हूँ तुम्हारे साथ.. अकेले नहीं। आदमियों को भले न देखूँ पहाड़ों और नदियों को छू लेना चाहता हूँ, हर तरह की जमीन का पेड़ लगा लेना चाहते हूँ उस घर में जहाँ तुम रहोगी, हर तरीके से कर लेना चाहता हूँ इज़हार, ताकि मरते वक्त मन आश्वस्त रहे कि कर पाया हूँ वैसा प्यार जैसा सोचता था, रह पाया हूँ उतना समर्पित जितना इस युग में रहा जा सकता है। बस इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारी चाह बना रहूँ मैं जब तक है मुझमें चेतना.. इतना तो चाहा ही जा सकता है न ? ************* उस शहर में हूँ जहाँ रहकर वह नहीं कर पाया जो करने का सोचकर आया था, लखनऊ यूनिवर्सिटी के पीछे और महमूदाबाद हॉस्टल के सामने देर तक खड़ा रहा, वहाँ से पैदल बढ़ा कपूरथला चौराहे तक, एक कैफे में चाय पी, यूनिवर्सल बुक सेंटर गया कुछ किताबें ली, फिर वहां से पैदल ही पापा के ऑफिस की तरफ गया , पब्लिक लाइब्रेरी के सामने दो पल रुका, उस जगह जाना चाहता था पर नहीं गया, वो कोना निहारा जहाँ साइकिल खड़ी करता था, ठीक ठीक ढंग से साहित्य यहीं पढ़ा था, मन भर, अमीनाब...