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तू जीवन की भरी गली, मैं जंगल का रस्ता हूँ।

साँस रुकने से पहले पहले, सारी राह चल लेना चाहता हूँ, सारी दुनिया एक बार देख लेना चाहता हूँ तुम्हारे साथ.. अकेले नहीं। आदमियों को भले न देखूँ पहाड़ों और नदियों को छू लेना चाहता हूँ, हर तरह की जमीन का पेड़ लगा लेना चाहते हूँ उस घर में जहाँ तुम रहोगी, हर तरीके से कर लेना चाहता हूँ इज़हार, ताकि मरते वक्त मन आश्वस्त रहे कि कर पाया हूँ वैसा प्यार जैसा सोचता था, रह पाया हूँ उतना समर्पित जितना इस युग में रहा जा सकता है। बस इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारी चाह बना रहूँ मैं जब तक है मुझमें चेतना.. 

इतना तो चाहा ही जा सकता है न ? 

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उस शहर में हूँ जहाँ रहकर वह नहीं कर पाया जो करने का सोचकर आया था, लखनऊ यूनिवर्सिटी के पीछे और महमूदाबाद हॉस्टल के सामने देर तक खड़ा रहा, वहाँ से पैदल बढ़ा कपूरथला चौराहे तक, एक कैफे में चाय पी, यूनिवर्सल बुक सेंटर गया कुछ किताबें ली, फिर वहां से पैदल ही पापा के ऑफिस की तरफ गया , पब्लिक लाइब्रेरी के सामने दो पल रुका, उस जगह जाना चाहता था पर नहीं गया, वो कोना निहारा जहाँ साइकिल खड़ी करता था, ठीक ठीक ढंग से साहित्य यहीं पढ़ा था, मन भर, 
अमीनाबाद की एक गली में घुसा, बाज़ारो में रंग तभी दिखता है जब साथ स्त्री हो, आदमी क्या ले लेगा, चूड़ियां, झुमके, दुप्पटे, चप्पलें, साड़ियां, देखता हुआ निकल गया, शोर बहुत था, जाम से पटी थी सड़क, और ऐसी कोई आवाज तो साथ है नहीं जिसके लिए इन आवाजों को सह लिया जाए। 


मैं चलता रहता हूँ, जो जो देखता रहता हूं, सोचता रहता हूँ यह उसे देखना था, यह उसके लिए लेना था, मैं खुद भी तो... 


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अपने लिए जीने का तमाम अर्थ तुम्हारे लिए जीने से खुलता है। सांस लेना और तुम्हारे बारे में सोचना दोनों एक बात है। 
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प्रेम आदमी को धैर्यवान बनता है, सहनशील बनाता है, वह हँसकर सुनने लायक बनाता है जो सुनकर वो लड़ पड़ना चाहता है। 

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पिताजी का वजन घटता जा रहा है, उन्हें भीतर ही भीतर क्या खा रहा है समझ ही नहीं आता, अब जबकि वह अपने दोनों बड़े दायित्वों से मुक्त हैं, मैं जितना कर सका किया कि उन्हें कहीं दौड़ना न पड़े, हाँ, आर्थिक मदद नहीं कर पाया..उसकी टीस है, खाना खाते और रास्ते में पैदल चलते बस उनकी सारी बात मेरी शादी पर टिक गई थी, कह रहे हैं कुछ नहीं तो अगले साल सगाई तो कर लो...मैं क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आता, यह अकेले का फैसला थोड़ी है, कैसे ले सकता हूँ, स्थिरता तो है नहीं... कितनी बातें हैं खैर! 
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एक अजीब सी थकान हावी है , कैसी पता नहीं। 

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तू जीवन की भरी गली
मैं जंगल का रस्ता हूँ। 

― नासिर काज़मी 

― 5 फरवरी 2025 / 9:30 शाम 

टिप्पणियाँ

  1. भैया कितना सुंदर लिखते है आप। काश भारत देश मे केवल लिखने से जीवन की आर्थिक आवश्यकताएं पूरी हो पाती। बाकी पापा का कहना भी उचित है।

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