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रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान

सतत प्रयास करके भी बहुत सारी रूढ़ियों को ख़त्म नहीं कर पा रहा हूँ, मैं जितने दिन रहकर उस पनपते कँटीले पेड़ को काटता हूँ , जैसे छोड़ता हूँ वह उससे दोगुनी जगह घेर लेता है और अधिक हरा भरा हो जाता है, इसको पोषण देतीं हैं हमारी बुढ़िया संस्कृति जिसका अपना हर अंग बेकाम हो गया है। मैं जबसे जानकार हुआ हूँ लगातार यह प्रयास करता रहा की मैं पहले वह परिर्वतन अपने घर में लाऊं जो बाहर बोलना चाहता हूँ पर मैं हर बार फेल ही हुआ, सोचता था परिवार में किसी शादी में दहेज नहीं लेने दूँगा, बड़े भाईयों की शादी में उनके पिताओं ने लिया, बहनों की शादी में हमारे पिता ने दिया। बहनों पर कभी किसी प्रकार की पाबंदी नहीं रही, वो पढ़ी लिखी, मेहनत की पर अभी कहीं जॉब नहीं कर रहीं हैं, प्रयासरत हैं, पर जब उनको चली आ रही जीवन शैली में रमी देखता हूँ मुझके कुढ़न होती हैं, उस शिक्षा का मतलब समझ ही नहीं आता मुझे, पुरूष भी वैसे ही हैं उन्होंने पढ़ाई ख़ूब की डिग्री ख़ूब है पर शिक्षित नहीं है, वो अभी उसी आँख से दुनिया देखते हैं जो आज से 2 हज़ार साल पहले वो साधू संत लिखकर गए थे जो खुद दृढ़प्रतिज्ञ नहीं थे एक अप्सरा की पुकार पर अपना ध्यान भूल जा...