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बुद्ध विषयक

बुद्ध को सच ही लाइट ऑफ एशिया कहा गया है। वह उन सभी काम की कुछ बेकाम की चीजों को जलाकर अकेले खड़े हुए थे जो नष्ट होने की कगार पर थे।  बुद्ध राख को भस्म नहीं, भस्म को राख कहने वाले थे।  गौर से देखा जाए तो उनका पथ कहीं से इतना नया नहीं था कि समझ से परे हो, उनके जन्म के समय के चमत्कार और भविष्यवाणी बिल्कुल वैसे ही है जैसे अन्य गढ़े और स्वीकारे गए देव पुरुषों के हैं।  बुद्ध इस भीषण संसार में ऐसा कोना हैं जो आपको भागने की जगह देते हैं और अपने भागने को उचित ठहराकर लौट आने का भी। बुद्ध छली हैं और डरे हुए भी। वो जिससे जन्में उम्र भर उसी से भागते रहे। उनकी तमाम शिक्षाएं भागने के बेहतर और लोक स्वीकार के तरीके हैं।  बुद्ध भारतीय संस्कृति में चारो ओर जड़ बना चुके बूढ़े पेड़ों के बीच खड़े अकेले बेल क्राफ्टेड पेड़ थे। उन्होंने पुराने पेड़ की शाखा काट दी जड़ वही रखी, एक पुरानी जड़ में उन्होंने एक नए पौधे की कलम दी और वह चल निकला। बुद्ध मरघट की जीवटता वाले हैं। बुद्ध हैं क्योंकि हम जन्मना बुद्धु हैं।  बुध्द हमारी बन्द आँख की दोनों पलकों को अपने हाथ की उंगलियों से जबरन फैलाकर क...

दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए

चुप होने से पहले हम बहुत बोल रहे होते हैं। हम अचानक से चुप नहीं होते हैं, एक प्रक्रिया के तहत धीरे धीरे किस्तों में चुप होते हैं। कभी अनसुना किए जाने से, कभी अपने बोले को बेअसर होते देखने से और कभी कभी अपने बौद्धिक दबाव से.. यह सब बहुत मध्यम गति से होता है, जब तक हमें आभास होता है तब तक वह हमारी पहचान बन चुका होता है। हम गढ़े जाते हैं किसी और के मन और बुद्धि के साँचे अनुरूप, हमें चुनने की आज़ादी नहीं होती, हमारे लिए जो चुना जाता है उसे ही हमारी आज़ादी कहकर हमें पकड़ा दिया जाता है। हम किसी को मन भर गले नहीं लगा सकते, उसे चूम नहीं सकते क्योंकि हमें वह सुचिता से जोड़कर बताया गया, जबकि हम बने ही दो देहों के मिलन से हैं। हमें बहुत सामान्य सामान्य सी बातों को भी इतना आदर्शीकरण करके बताया जाता है कि जब हमें ऐसा कुछ जीने को मिलता है तो हम अपने दिल और दिमाग के द्वंद्व से ही थक जाते हैं और उसे धकिया देते हैं जिसे समेट लेना चाहिए था। दर'असल यह परवरिश की खामी है। हमें जिन्हें खोलकर रखना चाहिए हम उसे ढंककर रखते हैं जो खुला रखना था वह ढंककर। कह देने पर यह बात स्वीकार नहीं की जाती है। जैसे मैं नहीं स्...