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'अन' उपसर्ग की तरह है सब

जैसे छुए हुए में है बहुत कुछ अन-छुआ, देखे हुए में अन-देखा, वैसे ही जिए हुए में बहुत कुछ अन-जिया है। जीवन अन उपसर्गों से बने शब्दों का समुच्चय है। हम जीते हुए भी बहुत कुछ जीना छोड़ते जाते हैं, और फिर हम जब कहते हैं सम्पूर्ण जीवन जी चुकने की तरफ हैं, तो उसी क्षण सोचते हैं, सम्पूर्ण में कितना पूर्ण रूप से जी सका ? गिनने के लिए हमारे हाथ की उंगलियां भी ज्यादा प्रतीत होती हैं। हम जितना पकड़ते हैं उसका कई कई गुना छोड़ देते हैं।  बीते दिनों के जिए को बार बार याद कर रहा हूँ, जिए हुए के बीच बचे हुए अनजिए पर रीझ रहा हूँ , भीतर की लालसा से बार बार दो चार हो रहा हूँ, और अकेला बच जा रहा हूँ।  जिंदगी की गणित सामान्य गणित से अलग है। यहाँ परिवार से कोई एक घटे तो सब अकेले हो जाते हैं। भटकते हुए शून्य की तरह। हम दो होते हैं, पांच होते हैं, छः होते हैं, दस होते हैं, फिर अकेले हो जाते हैं। सबके परिवार के बीच अपने परिवार को खोजना अब रिवाज़ है। हम एकाकीपन खोजते हैं फिर कहते हैं कि हम अकेले हैं।  बहुत सी भावनाओं के लिए मैंने एक बहुत सुंदर बात सोची आज, बात ये कि अगर जिये हुए को फिर फिर ज...

जाने कौन दिशा को बही पुरवईया

हर कोई समझा कर जा रहा है और मैं निरा मूर्ख कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरी बुद्धि शायद घास चरने चली गई है, लेकिन घास भी तो इस सदी में मुश्किल चीज है तारकोल अधिक है और सहज भी। शायद वही चाटने गई है। यूँ भी मुँह सिलने से बेहतर है चिपक जाए, ऐसी ही किसी मूर्खता से.. मैं कभी कभी सोचता हूँ वो तमाम लोग जो सबके लिए बोलते परेशान होते रहते हैं क्यूँ नहीं पी लेते हैं एक ग्लास फेविकोल, क्योंकि उनकी बुद्धि में यह तो घुसने से रहा कि उनकी बातों का कोई महत्व है। यह मैं अपने लिए भी सोचता हूँ। मुझे भी पी लेना चाहिए ..   रोज ब रोज मैं अपनी इस अस्थि चर्म वाली देह पर उम्मीद का लबादा लपेटे अपनी ही इच्छा के चरणों में दण्डवत करता हूँ और रोज कहता हूं अब कोई इच्छा नहीं, अब यह उम्मीद का लबादा भी उतार कर दूंगा फेंक या जला दूँगा वैसे जैसे जलाई जाती है देह प्राण उड़ जाने के बाद, लेकिन अगले ही क्षण नया और पुराने लबादे से बेहतर खोजने निकल पड़ता है हूँ। मेरा घर ऐसे अनगिन लबादों से भरा हुआ है लेकिन फिर भी जब जब मैं देखता हूँ कोई नया लबादा मन होता है यह भी तो होना ही चाहिए। इच्छा कोने में खड़ी मुस्कुराती ...