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'अन' उपसर्ग की तरह है सब


जैसे छुए हुए में है बहुत कुछ अन-छुआ, देखे हुए में अन-देखा, वैसे ही जिए हुए में बहुत कुछ अन-जिया है। जीवन अन उपसर्गों से बने शब्दों का समुच्चय है।

हम जीते हुए भी बहुत कुछ जीना छोड़ते जाते हैं, और फिर हम जब कहते हैं सम्पूर्ण जीवन जी चुकने की तरफ हैं, तो उसी क्षण सोचते हैं, सम्पूर्ण में कितना पूर्ण रूप से जी सका ? गिनने के लिए हमारे हाथ की उंगलियां भी ज्यादा प्रतीत होती हैं। हम जितना पकड़ते हैं उसका कई कई गुना छोड़ देते हैं। 

बीते दिनों के जिए को बार बार याद कर रहा हूँ, जिए हुए के बीच बचे हुए अनजिए पर रीझ रहा हूँ , भीतर की लालसा से बार बार दो चार हो रहा हूँ, और अकेला बच जा रहा हूँ। 

जिंदगी की गणित सामान्य गणित से अलग है। यहाँ परिवार से कोई एक घटे तो सब अकेले हो जाते हैं। भटकते हुए शून्य की तरह। हम दो होते हैं, पांच होते हैं, छः होते हैं, दस होते हैं, फिर अकेले हो जाते हैं। सबके परिवार के बीच अपने परिवार को खोजना अब रिवाज़ है। हम एकाकीपन खोजते हैं फिर कहते हैं कि हम अकेले हैं। 

बहुत सी भावनाओं के लिए मैंने एक बहुत सुंदर बात सोची आज, बात ये कि अगर जिये हुए को फिर फिर जीने की लालसा है, इच्छा है तो प्रेम है, नहीं है तो वासना है। बात बस इतनी सी है। बिल्कुल इतनी सी। मैं वासना की जीती जागती मूर्ति हूँ, प्रेम की वासना। मुझे उस एक दर से इतना आशक्ति है कि मैं दुत्कार के बाद भी वहाँ बैठे रहना पसंद करता हूँ किसी और दर पर जाने से।

दिन ऊबते, स्मृति में टहलते, क़िताब के पन्ने पलटते, बिस्तर से फर्श, फर्श से कुर्सी, कुर्सी से फिर फर्श, भरी भरी आंख पोछते बीता। अच्छा है सब.. शुभकामना।थोड़े बहुत संवाद हुए, पिताजी से बात हुई ,मां से गपशप, अपने आप से दूरी रही, हजारी प्रसाद द्विवेदी की लिखी एक नाटिका पढ़ी, उनके मन का यूटोपिया है पर आज समाज जिस दिशा में बढ़ रहा है उसे देखकर तो लग रहा है बिल्कुल सही कह रहे थे वो, नाम था 'भावी बसंत विभ्राट' बिल्कुल नयी आँख सी रचना है। भाषा बड़ी सुंदर है। 

आज अच्छा महसूस नहीं हुआ एक पल को भी, चित्त खिन्न सा रहा, जाने क्यूँ ? जैसे कुछ बहुत प्रिय सामान खो गया हो.. सामान सही शब्द तो नहीं है, लेकिन अभी मेरे मन मस्तिष्क में यही है। 

― 14 अक्टूबर 2025 

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