सुबह 4बजे के आसपास एक सपने से नींद खुली, फिर नींद नहीं आई, देर तक इधर उधर टहलता रहा। कुछ नहीं सूझा तो सब सफेद कपड़े धूल डाले, हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा कुछ पन्ने, समास पत्रिका का 26वां अंक पढ़ा, 2 घण्टे लगभग योग व्यायाम किया, निराला की पुण्यतिथि थी आज तो उनका स्मरण किया। उनकी दो कहानी दुबारा पढ़ी, जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे पसंद है, एक है सखी, दूसरी है ज्योतिर्मयी। नए तरह से मन की पड़ताल है।
सुबह की खुशी धीरे धीरे ख़त्म हुई। सूचना दर सूचना मन सिकुड़ता गया, अनन्तः शाम होते होते सिकुड़ कर न बराबर हो गया।
एक कोरियन ड्रामा का अनुवाद का काम मिला है, एक एपिसोड उसका काम करता रहा और घड़ी देखता रहा।
मैं गुब्बारे की तरह जीवन जीता हूँ, मेरा फूलना और मेरा पिचकना दोनों कहीं और से निर्धारित होता है, न हवा मेरी है जो मुझे फुलाती है, न कांटा मेरा है जिससे मैं पिचकता हूँ। मैं बस इंतज़ार करता हूँ, सपने देखता हूँ, और समय समाज और क्या करूँ ? नाम के कांटे से मेरे फूले रूप को पिचका देता है।
मन होता है अपने ही चेहरे को नोंच डालूँ, जीभ जितनी खींच सकूँ खींच लूँ , दिल निकल पाता तो निकाल कर उसे सामने रखता और तब तक धुलता जब तक उससे सारी स्मृति और भावुक होने ही बीमारी न धूल जाती।
हमें किसी का क्या होना पड़ता है ये कहने के लिए कि रुक जाओ और वो रुक जाए ?
भला है मेरे कमरे में घड़ी नहीं है, पहले दालान में एक घड़ी टँगी रहती थी, अब वो भी हटा दिया मैंने, नहीं तो हर क्षण मैं समय गिनता और सिर अकड़ जाता।
मन अजीब उब से भरा हुआ है। सीने में जैसे पत्थर रखा है, मन हो रहा है जोर से चिल्लाऊं और कोई न सुने, कमरे के भीतर जाने का मन ही नहीं हो रहा, मैं दीवार के उस रंग, उस खालीपन से तंग आ गया हूँ, मन करता है सारी दीवार का रंग सफेद कर दूं, लेकिन मेरा मन तो बहुत कुछ कहता है, मेरे मन का होता कहाँ है कुछ।
वह सब कुछ जो मैं नहीं सुनना चाहता, वह सब कुछ जो मैं नहीं चुनना चाहता वही क्यूँ मुझे बार बार सुनना पड़ता है, चुनना पड़ता है।
हम स्वयं से फैसला नहीं लेते और उसका कारण किसी और को बना देते हैं, यही मैंने किया था अब उस किए कर्म का फल भुगत रहा हूँ। कलयुग है न सब तुंरत मिलता है।
― 15 अक्टूबर 2025
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