ऊब जैसा कुछ कुछ भीतर होता रहा। हावी नहीं हुआ। अकेलापन नहीं महसूस हुआ। हुआ भी तो एक उम्मीद ने उस पर काबू रखा। अपने को अपने वश में करके जीने का जतन करता रहा। आधा सफल हुआ। रात बीतते बीतते मन भर रोया। हल्का हुआ। तो ख़्याल आया एक और साल अब मुँह बाए सामने खड़ा है यह कहने को कि अभी तक कुछ नहीं कर पाए ? हद है तुम नकारा ही रहे ! अब मन को दबाना सीख गया हूँ। दबाया और कुछ घड़ी निराला को पढ़ता रहा। मैं निराला और शमशेर की शाब्दिक गोंद में जाकर ही मानसिक मार से बच लेता हूँ। ********** कल रात नितीश भईया से बात हो रही थी, उन्होंने कई जरूरी मुद्दों पर बात की। कुछ ऐसे भी जिनपर खुलकर बात करना क्या सोचने तक पर पाबंदी है। यौन इच्छाओं का दबाव, स्पेस की कमी, लड़कियों के मन में जबरन का भरा हुआ सुचिता का विचार, जबकि वह हमारी मूल प्रकृति है, हम अपनी प्रकृति से हटते जा रहें हैं इसीलिए मनुष्य होने से भी चूकते जा रहें हैं। सेक्स बहुत सामान्य सी आवश्यकता है जिसकी पूर्ति भर की छूट, उतना स्पेस, हमें बनना होगा। सम्भवतः हमारी संताने इस मामले के अच्छा समाज पाएंगी, हम उन्हें खुलकर जीते देखना चाहते हैं। म...