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मेरे कानों में ग्लूमी सन्डे गाने की धुन गूँज रही है

आँख की निचली पलक काट लेने तक रोया गया। मैं रोना चाहता नहीं हूँ. मजबूर होता हूँ। इन दिनों लगातार मन एक अजीब सी हताशा और ऊब से भरा रहा जिससे पिछले कई बरसों से भरा रहता है। सपने ध्वस्त हो गए। जीवन फिर उसी लीक पर जाता हुआ दिख रहा है जैसे अब तक बीता है। मैं न आत्मिक रूप से संतुष्ट हूँ न दैहिक न मानसिक हर जगह एक समझौता सा कर रहा हूँ और जी रहा हूँ, वो समझौता किसके लिए और क्यूँ कर रहा हूँ पता नहीं, बस कर रहा हूँ। भीतर एक ग्लानि मिश्रित क्रोध ने डेरा जमा लिया है। मैंने मरने के सपने देखे, भाग जाने की इच्छा बनाई पर हर जगह असफल रहा।  मैं अपने को जहाँ भी खपाता हूँ वहीं से मैं बहिष्कृत सा बाहर निकल आता हूँ । कहीं भी मेरे अस्तित्व का मूल मुझे मिलता नहीं है। मेरी भावनाओं पर मेरा परिवार भी वैसा ही रिएक्शन देता है जैसे दूसरे बाहरी लोग देते हैं।  इधर आँख से दिखना थोड़ा और कम हुआ है, बीपी इतनी बढ़ी रहती है कि लगता है हमेशा भीतर एक नहीं कई दिल धड़क रहें हैं। नींद कई कई जतन करके भी नहीं आती। ये आर्थिक रूप से बहुत बेकार महीना गुजरा, उन सब ने हाथ खड़े कर दिए जिन जिन के लिए मैंने काम किया है। ...

कुछ कुछ में से कुछ जो बच जाता है

प्राकृतिक तरीके से होने की सम्भावना को अपने तरह से कर लेने की इच्छा और न हो पाने / कर पाने  के कारण जो टीस पैदा होती है, वही टीस भीतर बनी रही। एक और इच्छा पर पानी फिर गया। मैं देर तक सोच रहा था यह कैसे स्वीकार करूँ, अनन्तः भावनाओं को जज्ब कर लेना ही उचित लगा। कर लिया। क्योंकि सच ही कहा है, कि 'आपन सोचा कुछ नहीं हरि सोचा तत्काल' और उस तत्काल को जीने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है। गौर से देखो तो हर कहीं एक गहरी खाईं हैं, समतल, समतल में भी नहीं, वह भी खाईं ही है।  जीवन खुली आंख से बन्द आंख की तरह चलना ही है।  आज बहुत कुछ लिखा, कुछ चिठ्ठी, कुछ मन के द्वंद्व पर सब बकवास, उन्हें नहीं पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि सब मेरे मन के विकार हैं। डिलीट कर दिया।  सुबह जब टहल के और व्यायाम करके लौटा तो एक तितली भी मेरे साथ कमरे में घुस आई थी, वो दिन भर यहीं फड़कती रही। जाने क्या खाई होगी, उसे भूख तो जरूर लगी होगी, मैं दाल चावल खा रहा था तो सोच रहा था वो भी खाती तो खिला लेता साथ.. मैं इतना कठोर तो नहीं कि तितली न पाल सकूँ। पर वो खाई नहीं, एक दो बार पकड़ने का प्रयास किया...

अब यही रोज़गार है अपना

मैं बहुत खुशमिज़ाज किस्म का व्यक्ति नहीं हूँ। न ऐसा है कि मैं गंभीरता ओढ़े रहता हूँ। शांति ही मेरी प्रकृति है, मुझे तेज बोलना, तेज हँसना, बेवजह किसी को छूते रहना नहीं पसंद, ही हा हू भी मुझसे नहीं होता, मैं अपनी उपस्थिति में अनुपस्थित सा रहता हूँ, मुझे हर कहीं शामिल होने की भूख नहीं है। इन दिनों लोगों में जो एक स्वभाव पैदा हो गया है हर आदमी को पकड़कर फ़ोटो लेने लगना, बेवजह हर किसी को स्पर्श करते रहना, अनायास की बातों में झूठी हँसी खोज लेना, ये सब करते लोग मुझे निरे मूर्ख लगते हैं, मैं शामिल तभी होता हूँ जब कोई शामिल करे। बहुत संभावना है कि मैं प्रथम द्रष्टया पीड़ित या दुःखी सा कुछ अजीब लगूँ पर ऐसा है नहीं, मेरी नसों में बड़ी शीतलता है। मैं भीतर ही भीतर इन तमाम तरह की औपचारिकताओं में लहालोट लोगों को देखकर हँस लेता हूँ, मैं बोलने से अधिक करने वाले को बेहतर मानता हूँ, करता भी यही हूँ। यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ पता नहीं।  चित्त में तरह तरह के विचार आते जाते रहते हैं। उनके आने जाने से थका रहता हूँ। जब आप कोई इच्छा पाल लें और आपको लगे यह तो होगा ही जब वह नहीं होता तो त्वरित तो भले आप मैनेज कर लें...

'अन' उपसर्ग की तरह है सब

जैसे छुए हुए में है बहुत कुछ अन-छुआ, देखे हुए में अन-देखा, वैसे ही जिए हुए में बहुत कुछ अन-जिया है। जीवन अन उपसर्गों से बने शब्दों का समुच्चय है। हम जीते हुए भी बहुत कुछ जीना छोड़ते जाते हैं, और फिर हम जब कहते हैं सम्पूर्ण जीवन जी चुकने की तरफ हैं, तो उसी क्षण सोचते हैं, सम्पूर्ण में कितना पूर्ण रूप से जी सका ? गिनने के लिए हमारे हाथ की उंगलियां भी ज्यादा प्रतीत होती हैं। हम जितना पकड़ते हैं उसका कई कई गुना छोड़ देते हैं।  बीते दिनों के जिए को बार बार याद कर रहा हूँ, जिए हुए के बीच बचे हुए अनजिए पर रीझ रहा हूँ , भीतर की लालसा से बार बार दो चार हो रहा हूँ, और अकेला बच जा रहा हूँ।  जिंदगी की गणित सामान्य गणित से अलग है। यहाँ परिवार से कोई एक घटे तो सब अकेले हो जाते हैं। भटकते हुए शून्य की तरह। हम दो होते हैं, पांच होते हैं, छः होते हैं, दस होते हैं, फिर अकेले हो जाते हैं। सबके परिवार के बीच अपने परिवार को खोजना अब रिवाज़ है। हम एकाकीपन खोजते हैं फिर कहते हैं कि हम अकेले हैं।  बहुत सी भावनाओं के लिए मैंने एक बहुत सुंदर बात सोची आज, बात ये कि अगर जिये हुए को फिर फिर ज...

रात्रिदग्ध एकालाप

जाने क्यूँ कल से लगातार मैं दो चीजें कर रहा हूँ, एक तो एक गाने को लगातार गाए जा रहा हूँ वो भी ऐसे गाने को जिसको सुना नहीं है शायद सालों से, जो मुझे पसंद भी नहीं है। यह अजीब लग सकता है कि पसंद नहीं है तो याद कैसे है और गा कैसे रहा हूँ, लेकिन यही सच है।  दूसरा यह कि मुझे बार बार जाने क्यूँ जड़त्व का नियम याद आ रहा है। पिछले दो साल से मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं स्मृति में घूमता रहता हूँ, भौतिकी पढ़े मुझे 8 साल हो गए होंगे या ज्यादा पर अब मुझे उसके एक सिद्धांत सूत्र और परिभाषा याद आते हैं। इसका क्या अर्थ है पता नहीं ! जड़त्व का नियम याद करते रहना चाहिए। जीवन का नियम भी यही है।  *********** मैं समझ नहीं पाता हूँ समय तेजी से गुजर रहा है या घटनाएं तेजी से घट रहीं हैं। मन लगातार भावनात्मक उठापटक का मैदान बना रहता है, एक पल को मन खुश होता है, एक पल को सशंकित, एक पल को चिड़चिड़ा, एक पल को रोमांटिक, एक पल को भयभीत, एक पल को अकेला, एक पल को बिल्कुल बुद्धू, एक पल को विशुद्ध वैचारिक, एक पल को आशंका से भरा हुआ, एक पल को बच्चा, एक पल को बड़ा, एक पल को भाई, एक पल को प्रेमी, एक पल को बेट...

भागने से बचते हुए और और भागता हूँ

दिन भर ऊबते ऊँघते गुस्से से अपना ही होंठ खाते बीत गया। कभी कभी मुझे चिढ़ होती है, और वह क्यूँ शुरू होती है पता नहीं कर पाता। कोई विशेष और बड़ी वजह नहीं होती कोई छोटी मूर्खता बहुत होती है चिढ़ के लिए। कभी कभी तो मुझे इस बात पर क्रोध फूट पड़ता है कि कोई फूल क्यूँ तोड़ता है। कल ऐसा ही हुआ था। ऐसा क्रोध अपने भीतर मैंने कई साल पहले महसूस किया था, हैपी ( चचेरे भाई) तब छोटे थे, वो मेरे आस पास साइकिल दौड़ा रहे थे। मैं थका हारा स्कूल से आया था और गाय के चारे पानी के प्रबंध में लग गया था, भूख और थकन की वजह से मन पहले ही जल रहा था, उस बीच उसकी शैतानी और बार बार मेरे कहने के बावजूद न रुकने की वजह से मुझे ऐसा क्रोध आया था कि मैं खड़े खड़े काँप रहा था और उसी क्रोध में मैंने उसे इतना कसकर थप्पड़ मारा था कि साइकिल से गिर पड़ा।  क्रोध शांत हुआ तो दिनों तक पछतावा रहा। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था, मैं मना कर रहा था कि फूल मत छुओ वो उसे मसल गए, मैं इतना क्रोध में था कि अगर वो मित्र न होते तो मेरी अंगुलियां उनके गाल पर छपी होतीं, उस क्रोध के बाद मुझे बहुत सी घटनाएं याद हो आईं, बहुत से दिन याद आए, अप...

अन-कथ

रात नींद नहीं आई। बीता सब पढ़ता रहा। तस्वीरों और आवाज़ों में खोया रहा। एक आवाज़ मुझसे कहती रही 'छाया मत छूना मन' लेकिन मन छाया में ही घूमता रहा। इन दिनों धूप बहुत तेज है। मेरी त्वचा जल गयी है। खुद के कहे, लिखे शब्दों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि मैं अब अपनी माँ का बेटा नहीं बचा हूँ। मैं अब उसकी औलाद हूँ। वो जिसने मुझे नया जन्म दिया।  मैं बचपन में जितना क्रोधी ज़िद्दी और अकड़ से भरा हुआ आदमी था अब उतना ही शांत और सामंजस्य वादी हो गया हूँ। मैं परिवार का आदमी हो गया हूँ। पिछले कई वर्ष से मैं अपने परिवार में साम्य बनाने का प्रयास करता रहा, वो सब किया जो शायद आगे 40 की उम्र के बाद करना पड़ता। लचक और समझ यूँ नहीं मिलती बोझ और जिम्मेदारी हमें वो सीखा बना देता है जो हमने बचपन में सोचा था कभी नहीं होंगे। देखे सपने और मिले आश्वासनों पर नए आश्वासन की चकती लगाता रहा। मेरी कथरी में अनगिनत छेद हो गए हैं। मैं उसपर सुंदर रंगीन चद्दर बिछाकर छिपाने में लगा हूँ। अपने लिखे को पलट पलटकर पढ़ा। कुछ योजना जो सालों पहले बनायी थी वो आज तक अपने किसी रूप में नहीं पहुँची। आज हम सब जिस दशा में हैं वहाँ तक...

सूखे दिए की रौशनी में

कोई एक आवाज, कोई एक तस्वीर, कोई आँख, जिसमें अपने को देखा जा सके, कोई मन जहाँ हम दुनिया की हर शय से पहले हों, कोई एक शब्द, कोई एक सरल सा शब्द, या पुकार जिससे आप पुकारे जाना चाहते हों आपके दिनभर की या शायद हफ्ते या महीने भर की ताकत होता है, हम उसी अनुगूँज को बार बार सुनते हैं, कान के पास धीरे से सँकोचित आवाज में दो होंठो से निकली ध्वनि में नाचते रहते हैं। जैसे ढिबरी की बाती के रेशों से चढ़ते तेल से ज्योतिर्मय रहती है ढेबरी बिल्कुल वैसे आदमी अपनी पसंदीदा आवाज़ और स्पर्श में .. जैसे जैसे वह तेल कम होता है पहले कपड़ा जलता है, फिर ढिबरी बुझ जाती है, दुबारा जलाने के लिए हमें कपड़ा बदलना पड़ता है। कपड़ा बचा रहे इसके लिए जरूरी है तेल मिलता रहे, कपड़ा आदमी की शक्ल है। तेल उसके साथी का प्रेम। ****** मैं महीने भर से लगभग माचिस खरीदने की सोच रहा हूँ, लगभग हर तीसरे या चौथे दिन सोचता हूँ आज तो माँग ही लूँगा पर नहीं माँग पाता, हर मंगलवार जब नहा कर खड़ा होता हूँ तो अपने को कोसता हूँ, और हर दिन दूध लेकर लौटते सोचता हूँ, माँग लेना चाहिए था। पर न जाने कौन सा संकोच बैठा है, मैं माँग ही नहीं पाता, घर के...

घनी थी उलझन, बैरी अपना मन

कामनाओं की अति आदमी को आलसी कर देता है, वह एक ख़्याली दुनिया में रहने लगता है। वहाँ रहना घातक है। यूँ ही रचनात्मकता आदमी को मानसिक रूप से जितना चलायमान बनाता है, शारीरिक रूप से उससे कहीं अधिक आलसी बना देती है। मुझे जब जब घेरती हैं कामनाएं लिखता हूँ फाड़ देता हूँ। मैं इससे अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकता अपने मन के प्रति। इच्छाओं को लिखकर फाड़ देना, खुद को थोड़ा थोड़ा फाड़ना है। यह भावनाएं नहीं है.. इच्छाएँ हैं। इच्छाएँ होंगी तो हम चाहेंगे उन्हें कोई या जिससे वह इच्छा है वह उसे पूरा करे। हम किसी पर हावी होंगे। या खुद बेचैन रहेंगे और जब खुद बेचैन रहेंगे तो खुद से जुड़े लोगों को सुकून कैसे देंगे भला। बेहतर है कम से कम इच्छाओं का प्रकटीकरण हो। उन्हें भीतर ही भीतर काटते छांटते रहिए। भावनाएं अति वैयक्तिक होती हैं। और बहुत निजी। यह जिसके लिए होतीं हैं उससे साफ सपाट कह देना चाहिए। यह बोझ नहीं बनता, न बनाता है। हाँ भावनाओं को कहना भर हो उसे थोपना नहीं। ज्यादातर तो हम उन्हें वैसे का वैसे बता या जता नहीं पाते जैसे वह होती हैं। भावुक आदमी के बोलने के दो ही साधन हैं या तो आँसू या चुप्पी। मेरे पास द...

खुशी का दुःख

अपनी ही लिखी चिट्ठी को पढ़ता रहा। कई कई बार पढ़ा। और सवाल करता रहा क्या .. ख़ैर !  न जाने क्यूँ मैं भीतर से किसी सीलन भरी दीवार की तरह हूँ, तनिक भी याद आती है, कोई स्मृति भीतर रेखा खिंचती है तो मैं बस रो पड़ता हूँ। मेरे हाथ पाँव काँपने लगते हैं। तुम्हारी याद आई.. मैं सह नहीं पाया न खुद को संभाल पाया। बस रोया। सोचा नहीं बस आँसू बहते रहे, सीने में अजीब ही हलचल होती रही। जीवन कितना कठिन है। कितना कठिन है वैसा जीवन न जीकर वह जीवन जीना जो आप नहीं चाहते। धीरे धीरे हम समझ पाते हैं कि धीरे धीरे कुछ नहीं होगा जीवन में हमें दौड़ना पड़ेगा। अभी नहीं दौड़े तो आगे दौड़ने भर का सामर्थ्य भी नहीं बचेगा।  आज मैं दौड़ा। थोड़ा सा दौड़ा।  आज जीवन की सबसे सुंदर चौपाई पढ़ी। जिसे फ्रेम करा लूँगा। आगामी भविष्य उस चौपाई के किस्से सुनेगा। पिता जब ख़ुश होते हैं तो दुनिया कितनी ख़ुश होती है।  * बहुत कुछ जान कर भी आप बहुत कुछ से अंजान रहते हैं। हर वो आदमी जो कह रहा है कि वह खुली किताब है उससे ज्यादा बन्द कोई किताब नहीं, बन्द किताब भी उतनी बन्द नहीं होती जितना खुली किताब बन्द होती है। एक एक अक्षर पर कई कई तह अक...

लगभग तय

कल दिनभर दौड़भाग करने और खाना परोसने खिलाने में निकल गया। रात देर से आया यही कोई 12 के क़रीब। भीड़ में भीड़ की तरह मन दबाए दौड़ते रहने के बाद जब हम अकेले होते हैं तो सब दबाया फूट पड़ता है। अपने आप से सामना होता है। फिर बचता है समर्पित हो जाने के। जुड़े हर व्यक्ति की दिनचर्या है, उसमें हस्तक्षेप भी ठीक नहीं है। पिताजी न जाने क्यूँ बड़े हताश से थे। अपनों की भीड़ में भी जब गैरों से बात करना पड़े तो और क्या ही होगा। ख़ैर! .. डायरी खोलकर बैठा न जाने दिनभर का सोचा विचारा लिखा। नींद देर तक नहीं आई। बिस्तर पर कई तरफ से लेटकर देखा। थोड़ी देर जमीन पर लेटा रहा। सुबह देर से उठा। रात देर से लगभग सोने जैसा ही सोया भी था। देर से सोना और देर उठना कितना अपराधबोध भर देता है न हमारे भीतर ! फोन में तस्वीर देखता बिस्तर पर एक कोने कुछ घड़ी बैठा रहा। पिताजी की फटकार सुना तो वहाँ से उठा । कुछ घड़ी बालकनी में गमले देखा। कभी कभी सोचता हूँ हम कितने पापी हैं जिसकी पूरी पृथ्वी है उसे अंजुरी भर मिट्टी में समेट दिया है। अपने साथ भी तो हम यही कर रहे हैं। इधर उधर कुछ घड़ी किया, गुनगुना पानी पिया। नहाया। ब्रेड ले आया था उसे सेंक ल...
स्मृति की कचोट। झूठी हँसी की ओट ले छिपाता रहा आसूँ । जाने कैसा दिन बस बीत गया।  ― 24 मार्च 2025 / 9:15 रात

जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

सुबह सुबह बारिश हुई। उठकर बाहर टहलता रहा। पेड़ पौधों पर जमी धूल साफ हुई। बौर धूल गए। हवा थोड़ी ठंडी हुई । मार्च ही में जो जून सा माहौल है कुछ हल्का हुआ। मैं देर तक बैठा रहा। राग रामकली सुनता रहा। मुझे बारिश बहुत पसंद है। न जाने क्यूँ  ख़ूब सूखे पत्ते गिरे हैं। अब उठता हूँ पर कोई है नहीं जिसे दे सकूँ। अपने आप को आप कुछ नहीं दे सकते सिवा दिलासा के।  एक कहानी पढ़ी अमरकांत की 'मौत का नगर' । जातीय हिंसा की पृष्ठभूमि पर है। कथ्य अच्छा है, शिल्प भी अच्छा है पर कहानी कमजोर है। कुहासा कहानी पढ़ी है अमरकांत जी की और भी बीसियों कहानी पढ़ी है। अमरकांत जी के भीतर के कहानीकार का फ्लेक्चुएशन  होता रहता है । कभी कभी यूँ लगता है वह लिखने कुछ और बैठे थे लिख गयी कहानी, या उन्हें लग गया यह कहानी है तो उसे जहाँ लगा कामभर का हो गया वही छोड़ दिया। इनकी कहानी इंटरव्यू,  गले की जंजीर, ज़िंदगी और जोंक, फ़र्क, कबड्डी, यह अलग टेस्ट की कहानी हैं। ख़ैर ! मैं ग़लत हो सकता हूँ। मगर यह मेरा अपना अनुभव है।  दिन भर इधर उधर न जाने क्या किया। कुछ काम किया कुछ पढ़ा। साहित्य इतिहास के लगभग 30 पन्ने प...

फिर वही रात है

वही दिनचर्या। वैसा ही दिन । वैसी ही रात। दिनभर झकोर चलता रहा। मन हिलता रहा। कभी कभी लगता है जैसे ज़िन्दगी लगातार हड़बड़ी के लिए मिली है यहाँ सहेजो समेटो वहाँ जाओ, वहाँ भी वही करो। कुछ भी न स्थिर है न स्थाई। देश की दशा और मन की दशा एक सी है। मन भी उच नीच पहले और बाद की लड़ाई लड़ता रहता है। बस खून बहता है सफेद खून परिणाम कुछ नहीं निकलता। निकलेगा भी नहीं। इन दिनों लगातार मेरे मन में चलता रहता है कि कैसे.. कुछ नहीं।  चना काट रहा था सबकी बड़ी याद आई..पापा दीदी बच्ची सबको हरा चना भूनकर खाना पसंद है।  मुझे अजीब चिड़चिड़ाहट हो रही है। मन कर रहा है कहीं खड़े होकर चीख लूँ बस ― 18 मार्च  2025 / 7: 40 शाम 

कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

अलग अलग जीवों के लिए आक्सीजन भी अलग अलग ही होता है यह मैं धीरे धीरे महसूस कर पाया, बेहतर तरीके से तब जान पाया जब उसके छू लेने भर से अपने भीतर की उदासी को बिलाते देखा, एक कमरे को भरे पूरे घर की तरह महसूस किया। प्रेमी के लिए उसकी प्रेमिका की उपस्थिति ही प्राणवायु होती है क्या है कहना अनुचित है ? ******** नींद फिर वैसी ही आँख मिचौली करने लगी है। रात सपनों से भरी रहती है, कैसे सपने ? यह बेहद निजी बात है, इसे केवल वही जान सकती है।  सुबह से दो अजीबोगरीब घटनाएं हुईं। व्हाट्सएप पर एक अंजान नम्बर से लगातार 4 बार कॉल आया, फोन मुझसे यूँ भी एक बार मे उठता नहीं, सो उठाया नहीं, घण्टे भर बाद मन हुआ कि देखूँ वह अन्जान नम्बर किसका है तो प्रोफ़ाइल पर एक खाकी वर्दी पहने अधेड़ उम्र व्यक्ति की तस्वीर लगी थी, मुझे ढेरों मैसेज भेजे थे, जिसमें मैं किसी से वासना भरी बात कर रहा हूँ ऐसा कुछ मामला था, नीचे एक धमकी भी थी, आपको 2 दिन में हेरासमेन्ट के केस में गिरफ्तार करना है, फोन कीजिए.. मैं देर तक देखता रहा सोचता रहा ऐसी बात तो मैं अपनी प्रेमिका से कभी बहुत निजी क्षण में भी नहीं कहता, न कह पाउँगा। अ...

अजब साज़िशें हैं कहाँ आ गया हूँ

जो जीता हूँ लिख देता हूँ। लिख देने के बाद मन ही मन सोचता हूँ शायद अब यह न जीना पड़े, मगर फिर फिर उस लिखे हुए को जीना पड़ता है, 6 वर्ष पहले आख़िरी बार जब कहानी मन के गर्भ से कागज़ पर उतरी तो लगा था कुछ अच्छा कर ले गया, पर लिखने के कुछ दिन बाद वह सामने घटित हो गई तो भीतर एक डर बैठ गया, अब भीतर पटकथा बननी शुरू होती है तुरंत उसे मार देता हूँ, कभी कभी जब अपने को देख रहा होता हूँ तो लगता है मैंने कितने भ्रूणों की हत्या कर दी, मैं उन्हें बचा सकता था। यह तो वही गवईं ढकोसला हुआ न कि इस साल होली पर हमारे घर किसी का देहांत हो गया तो आने वाले किसी साल हम होली न मनाए, जीवन रोक देना कहाँ तक उचित है ? मगर फिर वही करता हूं क्यूँ ? पता नहीं। कभी कभी यह उचित भी लगता है। जब मन भावुक होता है तो समझदारी भरी बातों से कोफ़्त होती है। इतने दिनों से जो यह लगातार पन्ने रंग रहा हूँ इसका हासिल क्या है पता नहीं, यह सब कुछ कचरा है, अवशिष्ट निकल जाने के बाद ही कुछ काम का बचता है, देखते हैं कब तक यह अवशिष्ट ख़त्म होता है।  ********* दिन बीत ही नहीं रहा है जैसे, कुछ भी करता हूँ मन में बस समय चल रहा है, मगर यह समय है की ...