छोड़ देने से चीजें छूट जाती हैं। क्या यह सही है ? नहीं! छोड़ते जाने से चीजें छूट जाती हैं। वैसे ही जैसे रांझणा फ़िल्म में कुंदन ने डॉक्टरों द्वारा ज़बरन खींची गई साँस को छोड़ दिया था, वैसे जैसे गाइड में देवानन्द ने अपने को छोड़ दिया था और वैसे ही जैसे मसान में देवी ने अपने भूत को छोड़ दिया था। छूटना और जुड़ना सब कुछ ऐसे ही होता है। होने की इच्छा हो तो हो जाता है। जैसे जिसके लिए तड़प हो उसके लिए समय निकल आता है। कभी कभी जब कोई बहुत करीबी कहता है 'समय ही नहीं निकल पाया' तो इस बात को मैं सोचता हूँ कि समय कहाँ घुसा रहता है जो निकल ही नहीं पाता, समय का अपना मन कैसे हो गया ? समय तो हमारी ही बनाई घड़ी से चलता है न ? तो फिर कैसे ? लोग सच सच क्यूँ नहीं कह देते मन में मिलने की वह तीव्रता नहीं थी जैसे दूसरों से होती हैं, जिनके लिए समय गिना ही नहीं जाता। हम वही भूल जाते हैं, हम वही छोड़ देते हैं, और हम वहीं समय नहीं निकाल पाते हैं जहाँ हम चाहते नहीं हैं। हाईस्कूल में अंग्रेजी की किताब में एक चैप्टर था 'द फॉरगेटेन' उसमें जो सिद्धांत था वह यही था। ख़ैर इसे भी यहीं छोड़ देते हैं खींचकर लम्बा लि...