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हैं न होने के बराबर मगर हैं हम लोग..

कुछ भी पूरा नहीं है।अधूरा भी नहीं है। क्या है पता नहीं। हूँ भी या नहीं, नहीं पता ! कहीं कहीं तो होना शब्द शर्मिंदा हो जाता होगा मेरे साथ, जब कहता होऊँगा कि ' मैं हूँ यहाँ देख लूँगा ' यह कहने के तुरंत बाद ही मन पूछता है, खुद को तो आजतक देख नहीं पाए और सब कैसे देख लोगे? मैं भीतर की बातें भीतर ही दबा लेता हूँ। हँसता हूँ। सबसे पूछता रहता हूँ कोई दिक्कत तो नहीं है ? कुछ चाय नाश्ता लेंगे ? बैठने में असुविधा तो नहीं है ? पूछता रहता हूँ चलता रहता हूँ। भीतर मैं कलझता रहता हूँ, भीतर का सब देखने का अधिकार उसी का है जिसके लिए मेरी देह का स्वेद और वीर्य है। जिसके लिए मैं बाहर भीतर एक सा हूँ।  दिन भर दौड़ता भागता रहा। एक पैर जमीन पर रहा एक गाड़ी पर..  अन्ततः आप कितना भी बचें वो पकड़ ही लेते हैं जो आप बिगड़ते नहीं देख पाते। जिम्मेदारी स्वभावगत होती है। बताकर काम करवाया जाता है। सोचकर, देखकर और छोटी बड़ी आवश्यकताओं का अवलोकन कर उसे सही करना जिम्मेदारी भरे स्वभाव से होता है। मैं घर वालों और रिश्तेदारों की उम्मीदों पर इतना खरा उतर जाता हूँ कि मुझे सब पकड़ाकर वो कहीं आराम से बैठ जातें हैं।...