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सूखे दिए की रौशनी में

कोई एक आवाज, कोई एक तस्वीर, कोई आँख, जिसमें अपने को देखा जा सके, कोई मन जहाँ हम दुनिया की हर शय से पहले हों, कोई एक शब्द, कोई एक सरल सा शब्द, या पुकार जिससे आप पुकारे जाना चाहते हों आपके दिनभर की या शायद हफ्ते या महीने भर की ताकत होता है, हम उसी अनुगूँज को बार बार सुनते हैं, कान के पास धीरे से सँकोचित आवाज में दो होंठो से निकली ध्वनि में नाचते रहते हैं। जैसे ढिबरी की बाती के रेशों से चढ़ते तेल से ज्योतिर्मय रहती है ढेबरी बिल्कुल वैसे आदमी अपनी पसंदीदा आवाज़ और स्पर्श में .. जैसे जैसे वह तेल कम होता है पहले कपड़ा जलता है, फिर ढिबरी बुझ जाती है, दुबारा जलाने के लिए हमें कपड़ा बदलना पड़ता है। कपड़ा बचा रहे इसके लिए जरूरी है तेल मिलता रहे, कपड़ा आदमी की शक्ल है। तेल उसके साथी का प्रेम। ****** मैं महीने भर से लगभग माचिस खरीदने की सोच रहा हूँ, लगभग हर तीसरे या चौथे दिन सोचता हूँ आज तो माँग ही लूँगा पर नहीं माँग पाता, हर मंगलवार जब नहा कर खड़ा होता हूँ तो अपने को कोसता हूँ, और हर दिन दूध लेकर लौटते सोचता हूँ, माँग लेना चाहिए था। पर न जाने कौन सा संकोच बैठा है, मैं माँग ही नहीं पाता, घर के...

अ-धार्मिक लोगों की धार्मिक भीड़

हम अपना हृदय शब्दों के सहयोग से दर्पण की तरह खोलकर रख देते हैं, वो हूबहू तो नहीं मगर मन के आसपास तक पहुँचता हुआ लगता है, जिससे कहना है उसे कह देते हैं, फिर जब वो उन पीड़ाओं से दुःखी हो उठता है तो भीतर से ग्लानि पनपती है, अपने ही ऊपर क्रोध फूटता है, मन कितना अजीब होता है न ? वह चाहता है कि उसका प्रिय यह भी जाने उसके पीछे छूटा व्यक्ति उसे कैसे याद कर रहा है उसकी अनुपस्थिति को कैसे जी रहा है, उल्टा यह भी चाहता है कि उसका प्रिय हमेशा हँसता रहे उसे तनिक भी दुःख न हो, दुःख शब्द का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए उसके जीवन से..पर यह दुःख है की वह हमेशा किसी न किसी के सहारे चिपका रहता है, दुःख परजीवी है, वह अपने जीवन के लिए हमारा जीवन खाता है धीरे धीरे हम रोते है तो आँसू वही पीता है और बढ़ता रहता भीतर.. ऐसे लोग कितने किस्मत वाले हैं जिनके लिए कहीं कोई राह देख रहा है, जिनके लिए कोई मन सोच रहा है, वो कैसे होंगे जिन्हें कोई सोचता ही नहीं होगा, ऐसे लोग तो होंगे ही न जीवन में ? मन को मनभर कह जाने के बाद लगता है क्या मैं ही इतना सोचता हूँ, इतनी भावनाओं का जवाब केवल चुप्पी कैसे हो सकती है? बोल जाने के बाद लगता...

स्मृति का अपना एक अलग देश है

शाम देर तक एक गली के मुहाने पर बैठा रहा। यही जगह है जहाँ मैं बिना ऊबे घण्टों बैठ सकता हूँ। यहाँ की सड़क किनारे मैंने अलसुबह दुकान लगने से पहले और रात दुकानों और लोगों के सो जाने तक प्रतीक्षा किया है। यहाँ जब जब आता हूँ मैं भूल जाता हूँ कि मेरी स्मृति से परे भी एक दुनिया है। जीवन के सुंदर होने की जो एक कल्पना जीने का कारण बनी हुई है, उसकी एक बारीक़ सी किरण यहीं चारों तरफ़ खड़े ऊँचे मकानों से छनकर आती है। यहीं वह कमरा है जिसकी हर दीवार से मुझे प्रेम है। ईश्वर ने सामर्थ्य दिया तो मैं जिंदगी भर के लिए उस कमरे को किराए पर ले लूँगा, और जब जब जीवन से जीवन कम होने लगेगा जाऊँगा वहाँ उसकी दीवार से पीठ टिकाकर बैठा रहूँगा, उसकी फर्श पर निर्वस्त्र हो लेट जाऊँगा और उस कोमल पांव को अपनी देह पर महसूस करूँगा जो यहाँ चला करते थे। उन आवाजों की प्रतिध्वनि सुनूँगा जो कभी मुझसे कहे नहीं गए।   शहरीकरण में स्मृति से जुड़ी चीजें टूटती बनती रहती है, स्मृति तो कभी टूटती ही नहीं, वह एक बार जिस रूप रंग जिस साँचे में गढ़ दी जाती है फिर वैसी ही बनी रहती है, स्मृति वह इतिहास नहीं जो किसी के संवेदना से ...