कितना कह लूँ कितना लिख लूँ कि कहने और लिखने की जरूरत ही ख़त्म हो जाए, मामला बस समझने का बचे, क्या यह सम्भव है ? काश यह सम्भव होता, अगर यह मेरे प्राण की आहुति से भी हो पाता तो मैं तैयार हो जाऊँ बस कैसे भी यह कहने और लिखने की जरूरत खत्म हो जाए, प्रेम को भिखारी की तरह न माँगना पड़े। माँग कर मिली हुई चीजों में सुख भी नहीं होता, हम उसमें सहृदयता खोजते हैं, वह दृष्टि खोजते हैं, वह भाव खोजते हैं जो एक मन ख़ोजता है.. मगर वह नहीं मिलती। मिलेगी भी नहीं। सुख सदा स्वस्फूर्त चीजों से ही मिलता है वो भावनाएं हों या सामान.. दवाब में पका फल सुंदर दिखता है स्वादिष्ट नहीं होता। हम अभी अपने अपने स्वभाव अनुसार अपने अपने वातावरण में पक रहें हैं जिससे हमारा स्वाद बना रहे। ********** फरवरी आने को है..बस दो दिन और..यह पूरा महीना स्मृति का महीना है, जीवन का महीना है। मन इसी महीने की किसी तारीख को अपने स्थायी पते तक पहुँचा था। सम्भवतः इस महीने अकेले रहना पड़े। इन दिनों भी तो अकेले ही हूँ, मगर हम प्रेम में अकेले कब होते हैं ? अकेले होते हुए भी दो का अकेलापन होता है, श्रीकांत वर्मा की कविता पंक्ति को ...