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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता...

कितना कह लूँ कितना लिख लूँ कि कहने और लिखने की जरूरत ही ख़त्म हो जाए, मामला बस समझने का बचे, क्या यह सम्भव है ? काश यह सम्भव होता, अगर यह मेरे प्राण की आहुति से भी हो पाता तो मैं तैयार हो जाऊँ बस कैसे भी यह कहने और लिखने की जरूरत खत्म हो जाए, प्रेम को भिखारी की तरह न माँगना पड़े। माँग कर मिली हुई चीजों में सुख भी नहीं होता, हम उसमें सहृदयता खोजते हैं, वह दृष्टि खोजते हैं, वह भाव खोजते हैं जो एक मन ख़ोजता है.. मगर वह नहीं मिलती। मिलेगी भी नहीं। सुख सदा स्वस्फूर्त चीजों से ही मिलता है वो भावनाएं हों या सामान.. दवाब में पका फल सुंदर दिखता है स्वादिष्ट नहीं होता। हम अभी अपने अपने स्वभाव अनुसार अपने अपने वातावरण में पक रहें हैं जिससे हमारा स्वाद बना रहे।  ********** फरवरी आने को है..बस दो दिन और..यह पूरा महीना स्मृति का महीना है, जीवन का महीना है। मन इसी महीने की किसी तारीख को अपने स्थायी पते तक पहुँचा था। सम्भवतः इस महीने अकेले रहना पड़े। इन दिनों भी तो अकेले ही हूँ, मगर हम प्रेम में अकेले कब होते हैं ? अकेले होते हुए भी दो का अकेलापन होता है, श्रीकांत वर्मा की कविता पंक्ति को ...

इन दिनों की बात

भावना उस नदी का नाम है जिस पर बाँध सम्भव नहीं हो पाया है, जहाँ जबरन प्रयास हुआ भी वहाँ कुछ अच्छा नहीं हुआ। पानी को देर तक किसी पात्र में रखने पर वह सड़ जाता है, मगर अपनी सड़न के साथ भी बह निकलता है, दिन, महीना, साल लग सकता है मगर वह निकलता जरूर है। भावना पानी ही है, वो भावना सबसे सुंदर है जो लगातार अपनी गति के साथ बह रहा है, जब भावना दबाई जाती है तो वह कभी भी सकारात्मक रूप में दुबारा नहीं फूटती, नकारात्मक ही फूटती है। इस बात के कई जीते जागते उदाहरण इस देश की आबोहवा में मौजूद हैं जो समय समय रिसने लगते हैं फिर उनपर टांका लगाकर रोका जाता है, हर बार का दबाब उसे और घातक ही करता जा रहा है। यह एक दिन अपने विनाशकारी रूप में फूटेगा.. तब कुछ काम नहीं आएगा।  ************ क्या है कहना इस जमीन के साथ धोखेबाज़ी होगी कि मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता ?  ************* जब भी हम कहीं एक जगह होते हैं तो कई और जगहों पर नहीं हो पाते, दरअसल नहीं होना ही ईमानदारी है, लेकिन यही ईमानदारी कहीं अमानुषिकता है, कहीं छल, कहीं कुछ और..  फिर करें क्या ? क्या कहीं न होकर नहीं रहा जा सकता ? अजीब है! ल...

शब्दों में कैसे रोया जा सकता है ?

हम सब अपनी अपनी ज़मीन पर लड़ रहें हैं। हमारे संघर्ष हमारे अलावा कोई नहीं देखता। देखना भी नहीं चाहिए अन्यथा हम एक दूसरे से प्रेमभाव कम दयाभाव अधिक रखेंगे। दया और प्रेम में अंतर है बहुत बड़ा अंतर ।  ********** सबसे गहरी रुलाई हम बिना आसूँ बहाए रोते हैं।  *********** इतने आदमी हैं फिर भी हर आदमी अकेला है। क्यूँ ?  *********** नींद न आने की भी एक सीमा होती है, हम अपनी मन की जगह पाते ही छोटे बच्चों की तरह सोते हैं। फिर वो नींद कुछ पल की ही क्यूँ न हो पूरी लगती है।  *********** इन दिनों अश्वघोष को पढ़ रहा हूँ, बुद्ध को समझ रहा हूँ, और बार बार महसूस रहा हूँ कि परिवारिक जीवन जीना है तो साधू संतों से दूर रहना चाहिए, और साधू संतों के पास रहना है तो परिवारिक जीवन से.. दोनों एक साथ सम्भव नही। दोनों साधने में हम कई जिंदगी बर्बाद करते हैं।  ***********  जीवन जीना पग पग पर समझौता करना है, अपने प्रिय व्यक्ति से दूर रहना है। ऐसे जीवन मुझे नहीं जीना। मैं अब मर जाना चाहता हूँ... काश! यह डायरी का आख़िरी पन्ना होता। तो मैं इसमें लिखता मैं बहुत खुश हूँ। इतना ख़ुश की नहीं चाहता की...

सुंदर कोमल सपनों की बारात गुज़र गई जानाँ

आसपास अजीब सा माहौल है। लोग फिर से तैयारी में जुटे हैं, जिनके घर बच्चे हैं उनका उत्साह देखते बन रहा है, घरों पर नई जगमग लाइट लग गईं हैं, बाज़ार अपने साज सामान के साथ फिर तैयार हो गया है। लोग नए साल में जाने से पहले मन भर लूटेंगे। कई सवाल हैं, मगर करूँगा नहीं, उनका जवाब जानता हूँ, उस सवाल के बाद मेरी सोच पर उठे सवालों को भी जानता हूँ। जब उत्सव सा माहौल होता है, मुझे घर की बड़ी याद आती है..घर वो नहीं जो चार दीवारों का है, घर वो जो मुझे घर सा लगता है उसके बिना कुछ देखने का ही नहीं मन करता, न अच्छा ही लगता है, कल कैसे बीतेगा.. बीत जाएगा। बीता दिया जाएगा।  ********** चोट लगने से जो घाव हुए थे वो भर रहें हैं। चोट लगने के दौरान जितनी असहजता नहीं हुई उससे ज्यादा अब हो रही है। घाव जब भरने लगते हैं तो उनमें इतनी कलबलाहट क्यूँ होती है ? दुविधा यह है कि हम उसे कुरेध भी नहीं सकते। धैर्य बड़ी मुश्किल सी बात है । ********** आज विद्यापति को पढ़ रहा था, बहुत कुछ नहीं तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि शुद्ध रसिक आदमी थे। उन्हें कलावादी कहना कहाँ तक उचित है मुझे नहीं समझ आता ? अगर है भी तो ऐसी कला से कला क...

मुझे माफ़ करना समय !!

जितना सुख मन का कह देने में है उससे कहीं अधिक सुख मन को दबा लेने में है। तत्कालिक रूप से कह देना भले ही सुखद हो,पर दीर्घ कालिक रूप से मन का मन में ही दबा लेना सुखद है। सुखद यूं है कि हमारे मन की पीड़ा से कोई और पीड़ित नहीं होता। खुद की पीड़ा से दूसरे को भर देना कहां तक उचित है? मुझे यह उचित नहीं लगता। लेकिन यहीं एक सवाल भी उठता है कि ऐसा है तो फिर रिश्ते के मायने क्या हैं? जब मन का मन में ही रखना सुखद है तो क्यूं कहना किसी से कुछ, यह सुख ऐसे ही भोगा जाए बिना कहे, पर नहीं ! भोग भी तो अकेले का प्रयोजन नहीं है,कहना जरूरी ही है,और कहना ही एक मात्र विकल्प जिससे समझ आए, क्यूं नही कहना है।  कुछ नहीं कहना भी कुछ कहना है, यह जानकारी कुछ कहकर नहीं मिल सकती है। बहुत दिनों से डायरी से दूरी सी हो गयी है, ऐसा नहीं है की लिखता नहीं हूं, लिखता हूं, पर बस वही जो अति वैयक्तिक है उसके लिए... उसके लिए लिख देने भर से ही लगता है कुछ अच्छा रच दिया, लिखने की भूख कुछ क्षण को शांत हो जाती है। फिर जब लिखने की भूख जगती तो कलम उठाने का मन नहीं करता। दोहराव का डर लगता है। पर मजबूर होकर उठाता भी हूं तो उसकी ही ...