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Some open pages and returning thoughts

कितना मुश्किल है हाथ फैलाना ! उससे भी मुश्किल है खुले हुए हाथ पर लगाम लगाना, सोचते ही कुछ भी पा लेने और भविष्य की चिंता को जो होगा देखा जाएगा जैसे वाक्यों से धकिया कर वर्तमान को जी लेने लिए की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना। आत्मचेतस व्यक्ति हमें बस दूर से लुभावने लगते हैं जब हम उनके करीब जाते हैं तो समझ पाते हैं कि इस प्रसन्न और स्थिर मुख के पीछे कितनी छटपटाहट और अकुलाहट को दबाकर खड़ा हुआ मन है। यह राह बड़ी कठिन है। इस पर चलकर हम न चाहते हुए भी अपने प्रियजनों को कष्ट देते हैं।  बीते दिनों 27 वर्ष के जीवन में पहली बार पिताजी का भेजा पैसा वापस कर दिया, उन्होंने कई बार कहा क्यूँ वापस कर दिया ? क्यूँ वापस कर दिया ? रखे रहो। उस क्यूँ का जवाब है मेरे पास मगर वह समझ नहीं पाएंगे, वह हमेशा पिता की तरह सोचेंगे, या शायद मैं न समझ पा रहा होऊं क्योंकि मैं बेटे की तरह ही सोचूँगा। बड़ी बहन की शादी के बाद मैंने सोचा लिया था अब अपना बोझ पिताजी से हटा लेना है, पर कुछ कारणवश और अपनी अरामफहमी के चलते भूल गया, इस बार नही, दीदी की शादी के बाद से हर रोज़ लगता है जैसे मेरे कन्धे थोड़े और भारी हो गए हैं, उनके रहते म...