बोलते बोलते लगता है इस बोलने का कोई अर्थ नहीं और चुप हो जाता हूँ। चुप हो जाता हूँ तो बिना मुँह खोले मन ही मन बोलता रहता हूँ, मन को भी कहता रहता हूँ पर मन सुनता ही नहीं। क्या कोई जानता है की ये मन किसकी बात मानता है ? मैं उससे बात करना चाहता हूँ। ********* दिन सूर्य के दिखने से पहले हो जाता है और फिर पाँव तब तक चलते रहते हैं जब तक आँख को रौशनी से देखने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। वही सब खेती बाड़ी घर गृहस्थी नाते रिश्तदारी जिसकी कोई गिनती नहीं होनी है। मगर करना सब है। करना क्यूँ है का जवाब बस इतना भर है कि इससे परिवार की भावना जुड़ी है। जीवन का सारा सार भावना से ही तो है। कितनी गैर जरूरी बातें भी जरूरी लगने लगती हैं जब किसी चीज़ या किसी व्यक्ति से भावना जुड़ जाए, फिर आपके लिए वही जरूरी हो जाता है, अन्यथा जीवन का सब गैरजरूरी ही है। इसी गैरजरूरी और जरूरी के बीच जीवन पेंडुलम की तरह झूलता ख़त्म हो जाता है और आदमी न इधर का होता है न उधर का *********** 1 साल 1 महीने 17 दिन बाद भीतर ग़ज़ल की सी धुन तारी हुई है, एक शेर हुआ भी है, आख़िरी बार ग़ज़ल स्टेशन पर बैठकर कही थी उसमें...