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दिन-दारी

बोलते बोलते लगता है इस बोलने का कोई अर्थ नहीं और चुप हो जाता हूँ। चुप हो जाता हूँ तो बिना मुँह खोले मन ही मन बोलता रहता हूँ, मन को भी कहता रहता हूँ पर मन सुनता ही नहीं।  क्या कोई जानता है की ये मन किसकी बात मानता है ? मैं उससे बात करना चाहता हूँ।  ********* दिन सूर्य के दिखने से पहले हो जाता है और फिर पाँव तब तक चलते रहते हैं जब तक आँख को रौशनी से देखने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। वही सब खेती बाड़ी घर गृहस्थी नाते रिश्तदारी जिसकी कोई गिनती नहीं होनी है। मगर करना सब है। करना क्यूँ है का जवाब बस इतना भर है कि इससे परिवार की भावना जुड़ी है। जीवन का सारा सार भावना से ही तो है। कितनी गैर जरूरी बातें भी जरूरी लगने लगती हैं जब किसी चीज़ या किसी व्यक्ति से भावना जुड़ जाए, फिर आपके लिए वही जरूरी हो जाता है, अन्यथा जीवन का सब गैरजरूरी ही है। इसी गैरजरूरी और जरूरी के बीच जीवन पेंडुलम की तरह झूलता ख़त्म हो जाता है और आदमी न इधर का होता है न उधर का  *********** 1 साल 1 महीने 17 दिन बाद भीतर ग़ज़ल की सी धुन तारी हुई है, एक शेर हुआ भी है, आख़िरी बार ग़ज़ल स्टेशन पर बैठकर कही थी उसमें...

मन की पेंदी

मन जैसी चीज़ बनाई क्यूँ गयी ? यह सचमुच है या किसी लेखक की कल्पना का उत्पात है जो बरसों से लोगों के जीवन में आतंक की तरह रह रहा है।  मन बिन पेंदी के लोटे से भी गया गुजरा है, वह न ठहरता है न ठहरने देता है।  अरसे बाद अपना खून देखा, काम की हुई हथेली में जमा हुआ नहीं, सुंदर लाल खून, अभी तक गाढ़ा ही है। आशंका और एंजाइटी से इतर जब हाथ पाँव काँपते हैं तो मन के लोटे में पेंदी लग जाती है, वह रुक जाता, उस क्षण जो मुँह से पहला नाम निकलता है समझो वही आपका जीवन सार है..  आज तुम्हारा नाम निकला.. तो क्या मेरी ज़िंदगी तुम्हारे कन्धे पर पूरी होगी।  धन्यवाद आज के दिन के देवता..  ― 19 दिसम्बर 2024 / 11: 30 रात 

Some open pages and returning thoughts

कितना मुश्किल है हाथ फैलाना ! उससे भी मुश्किल है खुले हुए हाथ पर लगाम लगाना, सोचते ही कुछ भी पा लेने और भविष्य की चिंता को जो होगा देखा जाएगा जैसे वाक्यों से धकिया कर वर्तमान को जी लेने लिए की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना। आत्मचेतस व्यक्ति हमें बस दूर से लुभावने लगते हैं जब हम उनके करीब जाते हैं तो समझ पाते हैं कि इस प्रसन्न और स्थिर मुख के पीछे कितनी छटपटाहट और अकुलाहट को दबाकर खड़ा हुआ मन है। यह राह बड़ी कठिन है। इस पर चलकर हम न चाहते हुए भी अपने प्रियजनों को कष्ट देते हैं।  बीते दिनों 27 वर्ष के जीवन में पहली बार पिताजी का भेजा पैसा वापस कर दिया, उन्होंने कई बार कहा क्यूँ वापस कर दिया ? क्यूँ वापस कर दिया ? रखे रहो। उस क्यूँ का जवाब है मेरे पास मगर वह समझ नहीं पाएंगे, वह हमेशा पिता की तरह सोचेंगे, या शायद मैं न समझ पा रहा होऊं क्योंकि मैं बेटे की तरह ही सोचूँगा। बड़ी बहन की शादी के बाद मैंने सोचा लिया था अब अपना बोझ पिताजी से हटा लेना है, पर कुछ कारणवश और अपनी अरामफहमी के चलते भूल गया, इस बार नही, दीदी की शादी के बाद से हर रोज़ लगता है जैसे मेरे कन्धे थोड़े और भारी हो गए हैं, उनके रहते म...