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कहीं बे-ख़्याल होकर यूँ ही छू लिया किसी ने

बहुत कुछ नहीं न सही, इतना तो कह ही सकता हूँ कि अब बहुत कुछ कहने की गुंजाइश नहीं बची। सवाल कर सकता है कोई की गुंजाइश कब थी ? तो भी जवाब यही होगा कि कभी नहीं। हम कभी नहीं और यह आखिरी है करते करते यहाँ तक पहुँचे हैं। जैसे जैसे आदमी जानता गया, नया ख़ोजता गया, औपचारिक, व्यवहारिक और प्रेमिल हुआ वैसे वैसे वह वास्तविक मनःस्थिति से भागना भी सीख गया, उसे कटना और काटना आ गया। झूठ उसका प्रमुख गहना हो गया, उसे सिर पर, जुबान पर, मन पर, सुहागन स्त्री के आभूषण की तरह सजा लिया, और चलने लगा, अब तो आदमी इस गहने का इतना आदी हो गया कि उसे उतार लेने पर आदमी पागल हो जाता है वह आव बाव बकने लगता उसी गाड़ी जीवन पटरी से उतरकर भागने लगती है।  मैं यह सब क्यूँ कह रहा हूँ ? शायद कहने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए। मुझे इतना कहने की गुंजाइश है मुझसे आगे वालों को इससे भी कम होगी।  ***********  सुबह मौसम सुंदर था। मन के लिए तो सुंदर था फसलों के लिए बिल्कुल बुरा। सरसों कटी पड़ी है खेत में, जौ और गेहूँ भी लगभग पक गए हैं, चना तो बेकार ही हो रहा है। मगर अब आगे बारिश न हो तो बच जाएगा सब। सुबह सुबह बर्फ ...