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कई दिनों की कुछ कुछ बातें

◆ ढेरों अनुभवों से कुछ कुछ बातें जीवन की विसंगति यह है कि विसंगत दिनों में ही हमें सबसे ज्यादा इच्छाएं घेरती हैं, मन हज़ार राह पर चलना चाहता है यह जानते हुए भी कि पाँव सिर्फ दो हैं, हम बहुत कुछ कर लेने की इच्छा से इतना भरे होते हैं कि कुछ भी करते हैं और अपनी ऊर्जा को खपाते हैं। ऐसा क्यूँ है कि जब देह ऊर्जा से भरी होती है तो बुद्धि काम नहीं करती और जब बुद्धि काम करती है तो देह शिथिल हो चुकी होती है।  जाने क्या क्या कर रहा हूँ पता नहीं, बहुत कुछ इसीलिए कर रहा हूँ कि भीतर कुछ न करने के अपराधबोध को कम रख सकूँ। कल शाम पिताजी से बात हुई देर तक बात हुई वो कुछ भावुक किस्म की बातें कर रहें थे। सब ऐसा कहते हैं कि वह ऐसी बातें करते नहीं, पर जाने क्यूँ उन्होंने मुझसे हर तरह की बातें जी हैं, जिसका हमारे ही घर के और लोगों को शायद मेरे बताने पर भरोसा नहीं हो, पिताओं की छवि ऐसी क्यूँ होती है कि वो हमेशा पहाड़ की तरह देखे जाते हैं। मेरे पिता नदी हैं, बालू के नीचे से बहती नदी। उनका स्वास्थ्य थोड़ा खराब है इधर तीन दिनों से मौसमी जुकाम है। इस घर और उस घर हर जगह हाल यही है। कोई गाँठ और कमर दर्द से परेशान ...