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कई दिनों की कुछ कुछ बातें

◆ ढेरों अनुभवों से कुछ कुछ बातें

जीवन की विसंगति यह है कि विसंगत दिनों में ही हमें सबसे ज्यादा इच्छाएं घेरती हैं, मन हज़ार राह पर चलना चाहता है यह जानते हुए भी कि पाँव सिर्फ दो हैं, हम बहुत कुछ कर लेने की इच्छा से इतना भरे होते हैं कि कुछ भी करते हैं और अपनी ऊर्जा को खपाते हैं। ऐसा क्यूँ है कि जब देह ऊर्जा से भरी होती है तो बुद्धि काम नहीं करती और जब बुद्धि काम करती है तो देह शिथिल हो चुकी होती है। 

जाने क्या क्या कर रहा हूँ पता नहीं, बहुत कुछ इसीलिए कर रहा हूँ कि भीतर कुछ न करने के अपराधबोध को कम रख सकूँ। कल शाम पिताजी से बात हुई देर तक बात हुई वो कुछ भावुक किस्म की बातें कर रहें थे। सब ऐसा कहते हैं कि वह ऐसी बातें करते नहीं, पर जाने क्यूँ उन्होंने मुझसे हर तरह की बातें जी हैं, जिसका हमारे ही घर के और लोगों को शायद मेरे बताने पर भरोसा नहीं हो, पिताओं की छवि ऐसी क्यूँ होती है कि वो हमेशा पहाड़ की तरह देखे जाते हैं। मेरे पिता नदी हैं, बालू के नीचे से बहती नदी। उनका स्वास्थ्य थोड़ा खराब है इधर तीन दिनों से मौसमी जुकाम है। इस घर और उस घर हर जगह हाल यही है। कोई गाँठ और कमर दर्द से परेशान है कोई किसी से... पर चल सब रहा है। 

आज मैं यूँ ही बैठे बैठे सोच रहा था कि मैं इन सभी में से किसी के प्रति भी ईमानदार नहीं हूँ, अपने प्रति भी नहीं, उनके पूछे बहुत सवालों पर घुमा फिराकर जवाब देता हूँ, जबकि जवाब बहुत सीधा होता है। पिताजी की इच्छा है कि मैं और तरफ बढूं, कुछ अलग वैकेंसी देखूं पर मेरा मन नहीं है, मैं कह देता हूँ पर करता नहीं, मेरी आत्मा गवाही नहीं देती, शायद भविष्य में पछताना पड़े लेकिन वो पछतावा ठीक है। 

ख़ैर ! 

परसों सुबह सुबह लक्ष्मण सर ने फोन किया 'कि कहाँ हैं? हम आपकी तरफ हैं, दिनों बाद सर से मिलना हुआ था, बातचीत तो हो ही जाती है पर, मिलकर तो बिल्कुल बात नहीं होती, मुझे जैसे लगता है वो मेरी चुप समझते हैं, हम बस ज़्यादातर चुप बैठे रहते हैं, कुछ कुछ सर ने बताया, जीवन की उठापटक, पढ़ाई लिखाई, लेखन, कवि, ग़ज़लकार सब पर बात हुई। मैंने उनसे एक प्रस्ताव रखा कि अगर आप सहमत हों तो मैं आपको हर हफ्ते एक चिट्ठी लिखना चाहता हूँ और उस चिट्ठी में आपसे आपके जीवन के एक एक वर्ष के संस्मरण मुझे चाहिए, मैं ऐसे सवाल फ्रेम कर लूंगा कि आप ख़ुद लिख सकें, वो हँस पड़े और कुछ बोले नहीं, दरसअल मैं जितना जानता हूँ मुझे हमेशा लगता है कि एक गुरु के तौर पर वो जितने बेहतर हैं जितना पढ़कर पढ़ाते हैं उतना ही उनका जीवन भी जूझते हुए बीता है लगभग तो जानता हूँ पर लगभग और सब में अंतर होता है, सब तो वही लिख सकते हैं। उनसे मैं लिखवाना चाहता हूँ, उनकी कविता का सही सही मूल्यांकन नहीं कर पाया हिंदी समाज, वो लेखक संगठन में भी देर से जुड़े शायद यह भी वजह हो, या हो सकता हो कुछ और हो जो उनके कविता संग्रह पर किसी कवि ने नहीं लिखा, जबकि कविता संग्रह लगभग सबके पास होगी। इस मुद्दे पर बहुत लिखना उचित न होगा, शायद उन्हें इससे तकलीफ हो लेकिन यह मेरा मन है मैं इसे नहीं छिपा सकता। जाने जाने को हुए तो कहा शहर में त्रिपाठी सर भी हैं तो आज आपको परेशान करूँगा.. 

त्रिपाठी सर से देर दोपहर में मुलाकात होगी लगभग 45 मिनट पसीना पसीना होने के बाद वो आयोग से आए, जैसा मुझे सूचना मिली थी कि सर जल्दी में हैं उन्हें निकलना है तो आप देख लीजिएगा, पर त्रिपाठी सर ठहरे ठेठ बनारसी, मुझे नहीं लगता कि सर कभी गाँव रह पाएं होंगे, हमेशा अलग अलग शहरों में ही रहे, पर उनके भीतर उनके हाव भाव में उनके बोल चाल में सबमें गाँव के वो काका दिखते हैं जो हड़बड़ी में जा रहें हों और अगर आप बोलकार भर दें कि ' का हाल आहय काका' तो फुरसत से खड़े हो बतियाते हैं। लगभग 3 घण्टे मैं उनके साथ रहा। सुरती मलकर खाते मस्त अपनी लय में चलते रहे, उनके पास हर तरह के किस्से हैं, अकादमी जगत की हर राह से वो गुजरे हैं,
उनके साथ या आसपास रहते हुए लगता है समय तो दशमलव के कई अंक पीछे की रफ्तार से चल रहा है। खर्च किए एक एक पैसे का हिसाब देकर गए। उनके चेहरे और सिर के बाल भले सफेद हो गए हों पर वो हैं बच्चे जो बंद ट्रैफिक लाइट में आसपास खड़े लोगों से बोल बतिया लेता है। 

शाम को मंदिर गया था। दिनों बाद सुकून की कोई लय लगातार सुनता रहा, एक हँसी, एक छेड़, लगातार गूँजती रही, फिसलते रास्ते पर हम सम्भलकर चलते रहे और अनन्तः सही राह पा गए। अब इस राह की स्वीकार्यता दिखती है, झिझक खत्म हो गयी है, जिससे भीतर संतोष रहता है। कोई दो आँख जब आपको अपनी आँखों की तरह देखने के लिए हों तो आप दुनिया के सबसे मजबूत आदमी होते हैं। 

इन दिनों दोहों पर काम करते हुए जब जब फोन का कैमरा ऑन करता हूँ, भीतर तक कंपकंपी होती है, चिट्ठी और डायरी की याद आती है, मन होता है उस तरफ फिर से बढूं पर नहीं, कहीं कहीं मोह घातक है आप अटक जाते हैं। मैं इस राह में तो नहीं अटकना चाहता। इन दिनों बंगला साहित्य का इतिहास देख पढ़ रहा था, अदभुत चीजें जानने को मिल रहीं हैं एक कवि के विषय में जानकारी हुई , नाम है चंडीदास, उनपर बात करूँगा किसी रोज..

एक साथ कई चीज करता हूँ और कुछ नहीं करते हुए आदमी की तरह दिखता रहता हूँ। सब चल रहा है। चलेगा ही, यूँ भी कब कहाँ कुछ रुकता है। 

पता नहीं क्यूँ इधर कुछ दिनों से मुझे एक बात बहुत गहरे से महसूस होती है कि हमारी सभ्यता के सब लोगों ने हर व्यवस्था में हर आयोजन में  सिर्फ प्रवेश होना सीखा है निकलना नहीं, हम सब अभिमन्यु हैं और हमारे पास कोई अर्जुन कोई कृष्ण नहीं। 

― 12, 13, 14 , 15 / 2025

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