सुबह झाड़ू उठाया तो पहले रोया। इसी के लिए मैं कितना खीझा लेता था दीदी को, यहाँ साफ़ नहीं है, यहाँ जाला लगा है ये सही से रखो.. अब किससे कहूँ ? ख़ुद से ? ख़ुद से आख़िर कितनी बात की जा सकती है। इसे कैसे घर कहूँ मैं समझ ही नहीं पाता.. मेरा तो वैसे भी सब छितराया हुआ है। न यहाँ का हूं.. न कहीं का.. जबसे जन्म हुआ है दो बड़ी बहनों के साथ रहा, मुझे हमेशा लगा मेरी तीन माँ हैं, अपने से ज्यादा मेरे लिए परेशान रहती, परवाह करने वाला कोई कितनी बड़ी नेमत है ईश्वर की यह हम तब महसूस पाते हैं जब कोई नहीं बचता... अभी उस दिन दीदी को बस पता चल गया था कि मुझे.....वो तब तक रोईं जब तक मैं उनको जाकर गले नहीं लगा लिया। मुझे तो पहले लगता था बड़की दीदी ही पगली हैं अब लग रहा है दोनों एक ही तरह हैं.. साड़ी पहन के खड़ी होती हैं तो लगता है मां अपने यौवन के दिनों में लौट आई हैं। मेरी दादी भी दीदी ही थी। हमको दादी ने नहीं, इन्हीं दो बहनों ने रात रात भर कहानी सुनायी है। कई काम तो उनपर टाल देता था, अब तो एक ग्लास पानी देने वाला भी कोई नहीं है। न सुबह चाय का ग्लास पकड़े एक एक फूल देखते बतियाने वाला कोई.. मैं वैसे ही ब-मुश्किल बो...