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नए में नया कुछ भी नहीं

हर आम दिन की ही तरह रहा आज का दिन भी और कल की रात भी, रात में और आंख तर होती रही थी। भागकर घर चले जाने का मन होता रहा पर भागना कहाँ हो पाता जब एक बार जीवन जाल में फंस जाओ तो..  अकेले थे। बिल्कुल अकेले। जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। किताबें पढ़ने का प्रयास किया, असफल रहा। उसके बात करने का प्रयास किया, असफल रहा। नींद नहीं आई। सोचा हुआ न हो तो भीतर की सारी ऊर्जा देर तक मेरे साथ तो कई दिनों तक हिली सी रहती है, मैं बता भी नहीं पाता कि मुझे बुरा लग रहा है या मुझे ये चाहिए, दरअसल मुझे क्या चाहिए यह मैं जान ही नहीं पाता। सुबह पैदल दूर तक चलता रहा। सर्द इन दिनों बढ़ी हुई है। गलन से लगता है, नाक कान अँगुलियां कट जाएंगी। पर ऐसी सर्द सुबह में टहलना मुझे बहुत पसंद है, बड़ी नीरवता रहती है, आसपास धुंध के अलावा कुछ नहीं होते, इन दिनों कुत्ते के छोटे छोटे बच्चे टहलते रहते हैं, उनके साथ खेल लेता हूँ, एक ही तरह से बना हुआ मुँह कुछ पल को इधर उधर हो लेता है।  दोपहर तक सोचता रहा कोई तो नए वर्ष पर फोन कर दे, नहीं आया तो खुद ही कर दिया। उसे ही जिसे कर सकता हूँ बिना झिझक।  आज दिनों बाद मुझे लगा कि मैं ...

चक्कर ही चक्कर है दुनिया में

जीवन आवृत्ति के सिवा क्या है? हम जहाँ से ऊबकर थककर परेशान होकर भागते हैं फिर वहीं लौट आते हैं न चाहते हुए भी,  इस आवृत्ति में ही सब शामिल होता जाता है और हम भारी होते जाते हैं। हल्के हम मृत्यु से भी नहीं होते, मृत्यु हमें हल्कापन नहीं देती, आवृत्ति का बोझ उठाए चलते रहने से थकी देह को आराम देती है कि लो बैठ लो आगे फिर चलना है, इस आवृत्ति में मिला बोझ उठाकर ही..  अनन्त का जो चिन्ह है उसे कभी करीब से देखो तो कितना भयावह है वह, कोई ओर छोर ही नहीं..  कुछ शब्द बार बार मन में घूमते हैं, उन्हें लिख चुका हूँ, फिर उन्हें लिखना नहीं चाहता, अब उन्हें सोचना भी नहीं चाहता, फिर भी वो मेरा पीछा नहीं छोड़ते.. काश छोड़ देते !  कई सालों के कैलेंडर उठाकर देख लिया है, उसमें कोई ऐसी तारीख नहीं जिसमें मैं पूरा दिन सुख से जिया होउँ, चिंता, अपमान, ग्लानि, नाम की कोई रस्सी हर दिन मेरा गला कसती गई है। कसती गई है। धीरे धीरे मैं कसाव का आदी हो गया। अब मुझे कसाव और जकड़न में ही चलने की आदत है, स्वतंत्रता में चलने में बड़ा अजीब महसूस होता है।  जीवन के बीतते हर दिन के साथ मैं यह महसूस करता जा रहा ...

मैं किस दरवाजे से आया था

बीते तीन दिन बिस्तर पकड़े बीत गया, बुखार और सर्दी ने जो हाल किया है कि पूछो मत। आज गले से कुछ आवाज निकल रही थी, इन दिनों में बस एक मौन स्वर में पुकारता रहा कि काश कोई तो कुछ घड़ी बैठे मेरे सिरहाने, पर यहाँ इस शहर में अकेले पड़ा हूँ, कभी कभी सोचता हूँ, कहीं किसी दिन ऐसे मर गया तो लोगों को पता भी बड़ा देर से ही चलेगा। कहने को इतना.. ख़ैर  सारे जतन किए जिससे जितना जल्दी ठीक हो सकूँ हो जाऊँ पर यह सही होने का नाम नहीं ले रहा, आज दोपहर में बुखार यूँ था की देह काँप रही थी। इन दिनों में कुछ नहीं किया बस बिस्तर पकड़े पड़ा रहा, कुछ कविता संग्रह पलटता रहा, कुछ कहानी पढ़ी, दो फिल्में देखी, 'बारामुला' और 'स्कारफेस'.. दोनों अपने आप में अपने कॉन्सेप्ट में अदभुत हैं। कश्मीरी पंडितों पर हुई बर्बरता को बारामुला में जिस ढंग से दिखाया गया है वो बिल्कुल नए ढंग का है, बिल्कुल कसा हुआ निर्देशन, मन काँप के रह जाता है।  स्कारफेस 80 के दशक में क्यूबा शहर के शरणार्थियों और ड्रग माफिया गैंग की कहानी है, फ़िल्म में अल पचिनो ने अपूर्व काम किया है, उनके हाव भाव से दहशत भरती है वह देर तक रहती है।  आज दिन भर कु...

पता नहीं क्या , मगर कुछ

ज़िंदगी की गाड़ी जैसे ही पटरी पर चढ़ने लगती है कोई कहीं न कहीं से कुछ ऐसा प्रबंध कर देता है कि फिर उतर जाए और उतर जाती ही है क्योंकि आदमी के जीवन में रिश्तों का जाल ऐसा है कि जाल का कोई एक धागा कहीं से टूटे टूटता पूरा जाल है। मन जैसे ही कही न कहीं से आश्वस्त होने लगता है कोई न कोई घटना ऐसी घट जाती है कि ..  दिन अजीब सा बीता, कल शाम से मन थका सा था, टूटा सा कुछ कुछ वह बना रहा, कुछ कुछ पढ़ पाया, सोची हुई योजना पर समय ने अपनी योजना रखी और कुछ भी मन का नहीं हो सका। चिल्लाते लड़ते और कुछ जनों के गंवारपने पर कोफ़्त खाते बीत गया। भीतर इतनी बातें, इतना क्रोध इकट्ठा हो गया था कि शरीर उसे पचा नहीं सका। अन्ततः ख़ूब उल्टियां हुईं। एक मित्र दिल्ली से आए थे उन्हें समय न दे सका, दुःख इस बात से अधिक है कि वह समय मैं न अपने को दे सका न अपने मन को ही। बस कल्पता रहा, भीतर एक अजीब सी कुढ़न होती है। कभी कभी मन होता है अपना सिर फोड़ दूँ। कल मुझे देर रात तक समझाया गया था, मैं उसे लागू करने का प्रयास कर रहा था और फिर आज.. मैं जिस चीज़ से जितना कटना चाहता हूं उतना ही फँसता जाता हूँ। अब तो लगने लगा है ऐसे ही फँसे फँस...

जीवन के इंद्रजाल में

इन दिनों में मन बासी भोजन की मानिंद हुआ रहता है। मिर्च मसाला पाक सब सही होने के बावजूद स्वाद गायब है, स्वाद उस भीतरी गर्मी से था जो भोजन में अब नहीं है।  कल की शाम खुशनुमा थी। आलोक ही आलोक था चारो तरफ, पटाखों की गूंज थी और दीपों की रौशनी। पर यह आलोक मनुष्य की उपस्थिति से धूमिल हुआ जाता था, अब हर जगह आदमी इतने हो जाते हैं कि कितनी भी व्यवस्था हो वह अव्यवस्था में बदल जाती है। मुझे साथ सुंदर लगता है, लेकिन सबका नहीं, सबके साथ को साथ कहा भी तो नहीं जा सकता, साथ वही अच्छा है जहाँ दो मस्तिष्क एक तरह की जीवन शैली के आसपास के हों, उनके पैरामीटर लगभग एक जैसे हों। इन सबके बावजूद जो सबसे जरूरी सेतु है किसी साथ में वह है टॉलरेंस और अपने से ऊपर किसी को रख सकने की क्षमता।  मौसम अब नम हो चला है, हवा न भी चल रही हो तो भी लगती है, ठण्ड अपने पांव पसार रहा है। मैं यूँ ही हल्की हवा और धूल से छींकने लगता हूँ, वही हुआ।  कुछ क्षणों को ख़त्म नहीं होने देने का मन करता है। कुछ साथ बिल्कुल नहीं छोड़ने का मन करता है, पर..  कभी कभी सोचता हूँ क्या मैं सबको विदा कहने के लिए ही बना हूँ क्...

जो कुछ हो सकता था

बहुत लंबी कविता हो या कहानी बोझिल हो जाती है, भावनाओं को ज्ञान से पाट देना किसी विद्या में सत्यापित नहीं हो सकता। अगर ज्ञान देना है या कोई तर्कसंगत बात करनी है तो निबंध या या लेख रूप है कविता कहने या कहानी कहने की जरूरत क्या है ?   मैं नहीं स्वीकार पाता। भावनाओं में तर्क कभी नहीं फिट हो सकता है। जहाँ होगा वहाँ भावना पीड़ित दमित होगी।  ********* मर्द बर्फ का पहाड़ है जिसे प्रेम की गर्मी से ही पिघलाकर जल किया जा सकता है और किसी से नहीं।  ******** दिन भर निगाह बार बार फोन पर ही रही। जाने क्या देखता अगोरता रहा। एक बात तो है.. इंतजार करने वाले को समय जितना बेहतर पता होता है उतना किसी को नहीं।  आज ख़ूब सोया हूँ, दोपहर में भी सो ही रहा था, आज व्रत था तो कुछ खाने पीने की चिंता थी नहीं, बस सोकर दिन काटने का जतन किया। कमरे के सामान  इधर उधर किया। कुछ पढ़ा। आज सातवें दिन बाहर कुछ दूर बाइक लेकर निकला।  गमले में लगाये हुए पौधों में फूल आ रहे हैं, इन दिनों अडेनियम और गुलाब खिल रहा है, रातरानी का पौधा बहुत छोटा सा है फिर भी दो चार फूल रोज रहता है। आज हरश्रिंगार में कुछ न...

जो कुछ कहा जा सकता है

छोटी छोटी इच्छाओं पर बड़ी बड़ी जिम्मेदारी आकर बैठ जाती हैं और मन मसोस कर सोचता हूँ चलो फिर कभी.. यही करते करते 28 का होने को आया।  मैं कभी अपने किए, वादों, इरादों, देखे हुए सपनों, न जी पाए हुए पलों को सोचता हूँ और भूल जाता हूँ कि मैं यह हूँ जो यह लिख रहा है।  कहता हूँ और अपने कहे पर एक उदासीन भाव देखकर सोचता हूँ, काश !  यह कहा हुआ, अनकहा हो सकता या इस कहे की और उसपर न हुए अमल की स्मृति को मिटाया जा सकता तो मिटा देता, पर यह कहाँ सम्भव है। हम धीरे धीरे यह महसूस करते हैं कि हमारी ताकत, हमारा चार्म मिट रहा है और हम उसे मिटते देखते हैं।  भारतीय जीवन संस्कृति जिस तरह बनी है और हमारे भीतर जिस तरह के संस्कार भरे गए हैं वो हमें बचपन से भीरु बनाते हैं, हमें संशयी बनाते हैं कि हम अपने फैसले और अपने लिए फैसले तो ले ही न सकें। हमने तमाम दर्शन बनाए, ख़ूब नीतियां गढ़ी पर जब जमीन पर देखो तो सब बेकार है, वहाँ बनाने वाला ही वही कर रहा होता है जिसे वो करने को मना करने को लिखता कहता है। इतनी गुथमगुत्थी है कि कोई एक डोर पकड़ो तो उसे और कई डोर पकड़ कर कस लेतीं हैं, आप अकेले निकलना चाहें तो आपको...

किसको फुरसत है जो थामे...

मैं फुरसतिया आदमी हूँ, मैं इतना फुरसतिया हूँ मैं सबको याद करता रहता हूँ, और सब इतने व्यस्त हैं कि उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती। मैं एक दिन अपनी तमाम फुरसत को मौत के हाथ बेंच दूँगा जो हमेशा व्यस्त रहती है।  ******* मन कहाँ है यह तो मन भी नहीं जानता, हां इतना जरूर जानता हूँ कि जहाँ कहीं भी 'लेकिन' है वहाँ मन नहीं है।  ******** दिन भर बस दिन बीतने के इंतज़ार करता रहा। कुछ पढ़ा, ज्यादा सोचा, व्यस्तता के विषय में सोचता रहा।  ********* चिंघाड़े मार कर रोने का मन होता है, क्यूँ होता है पता नहीं, कोई दुःख नहीं, कोई उम्मीद नहीं है, न किसी से कुछ चाहिए, बस ऊब गया हूँ। किससे ऊब गया हूँ यह भी नहीं पता है।  मन नहीं कर रहा है कुछ लिखने का ! ―  24 oct 2025 

जाने किस चीज की कमी है अभी

लिख देने से न तनिक भर कुछ घटता है न बढ़ता है, शायद बढ़ता है। क्योंकि और भारीपन लगता है, देर तक लगता रहता है अपना ही सिर अपने कंधे पर उठाए घूम रहा हूँ। ज्यादातर तो यही लगता है कि सिर का बोझ शरीर के बोझ से ज्यादा है।  बीते दिन फिर न लौटने वाले दिन बनें यही कामना है। जहालत, मलामत, उदासी, आँसू, गरीबी, दबाव, अकेलापन, इन सबसे ऊपर फेलियर का टैग लिए चलता रहा और सबसे हँसते हुए मिलता रहा, कहीं किसी की दवा घटी है कहीं कोई टेस्ट करवा रहा है, कहीं कोई सब होते हुए भी नहीं खा रहा, कहीं कोई दिन भर में चार बार इस बात पर रो रहा है कि कोई है ही नहीं, मैं सब तरफ दौड़ता हूँ, और हर जगह अकेला हो जाता हूँ। सब तरफ शिकायत है, सब तरफ कोई न कोई चाहता है मैं वहाँ भी पहुँच जाऊँ, मैं कितना फैलाऊं अपने दो हाथ दो पाँव की सब जगह पहुँच जाऊँ ? मैं इन सभी में से किसी जगह नहीं रहना चाहता, मैं जहाँ रहना चाहता हूं, वहाँ दूर तक निर्जन है, मेरे कहे की ध्वनि है प्रतिक्रिया कोई नहीं।  आज दिन भर में इतना बोला हूँ कि अब माथा सनसना रहा है। सिर दर्द से फटा जा रहा है, कमर अजीब सी ऐंठ रही है, कुछ खाने का मन नहीं हुआ।...

रियाज़

दिन भर बस पड़ा रहा, इस करवट से उस करवट, आँखे सूज आईं थीं जाने क्यूँ, भीतर लगातार घबराहट होती रही है कल से ही, वो रुकने का नाम नहीं ले रही है। मैं बिस्तर जमीन कोना कुर्सी सब छान चुका हूं यह कहीं शांत नहीं हो रही है। ऐसा कुछ सोच भी नहीं रहा हूँ। ऐसा कुछ क्या कुछ भी सोच नहीं रहा हूँ, न किसी बात से परेशान हूँ, न कोई इच्छा या उम्मीद है। बस एक उब है। जाने किस चीज की लेकिन है। मैं फोन फेंक देना चाहता हूँ। मुझे किसी से बात करने का मन नहीं करता। किसी मतलब किसी से नहीं..  दिन भर में चार बार कपड़े बदले, कुछ किताबें उठाई रखीं, कई भजन कीर्तन सुने, कुछ ग़ज़लें भी.. जाने क्यूँ संगीत में खासकर शास्त्रीय संगीत में मुझे अद्भुत शांति मिलती है। देर तक राग रामकली सुनता रहा और बिस्तर पर पड़ा रहा। शाम एक फोन से उठा। आज दिन भर में किसी का फोन नहीं उठाया, बोलने का मन नहीं कर रहा था। सोच रहा हूँ सप्ताह में एक दिन मौन व्रत रखना शुरू करूँ।  हम सब एक टूल हैं, जिसे हर दूसरा अपनी जरूरत अनुसार उपयोग में लेता है और फिर टूल बॉक्स में रख देता है। इस वाक्य का अर्थ क्या है मैं खुद नहीं जानता लेकिन लिख दिया क्योंकि चल ...

ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर

सुबह 4बजे के आसपास एक सपने से नींद खुली, फिर नींद नहीं आई, देर तक इधर उधर टहलता रहा। कुछ नहीं सूझा तो सब सफेद कपड़े धूल डाले, हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ा कुछ पन्ने, समास पत्रिका का 26वां अंक पढ़ा, 2 घण्टे लगभग योग व्यायाम किया,  निराला की पुण्यतिथि थी आज तो उनका स्मरण किया। उनकी दो कहानी दुबारा पढ़ी, जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे पसंद है, एक है सखी, दूसरी है ज्योतिर्मयी। नए तरह से मन की पड़ताल है। सुबह की खुशी धीरे धीरे ख़त्म हुई। सूचना दर सूचना मन सिकुड़ता गया, अनन्तः शाम होते होते सिकुड़ कर न बराबर हो गया।  एक कोरियन ड्रामा का अनुवाद का काम मिला है, एक एपिसोड उसका काम करता रहा और घड़ी देखता रहा।  मैं गुब्बारे की तरह जीवन जीता हूँ, मेरा फूलना और मेरा पिचकना दोनों कहीं और से निर्धारित होता है, न हवा मेरी है जो मुझे फुलाती है, न कांटा मेरा है जिससे मैं पिचकता हूँ। मैं बस इंतज़ार करता हूँ, सपने देखता हूँ, और समय समाज और क्या करूँ ? नाम के कांटे से मेरे फूले रूप को पिचका देता है।  किसने बनाया ये नियम की कह दी गई बात वापस नहीं होगी ? देख लिया गया सपना भुलाया नहीं जा सकेगा ...

जाने कौन दिशा को बही पुरवईया

हर कोई समझा कर जा रहा है और मैं निरा मूर्ख कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरी बुद्धि शायद घास चरने चली गई है, लेकिन घास भी तो इस सदी में मुश्किल चीज है तारकोल अधिक है और सहज भी। शायद वही चाटने गई है। यूँ भी मुँह सिलने से बेहतर है चिपक जाए, ऐसी ही किसी मूर्खता से.. मैं कभी कभी सोचता हूँ वो तमाम लोग जो सबके लिए बोलते परेशान होते रहते हैं क्यूँ नहीं पी लेते हैं एक ग्लास फेविकोल, क्योंकि उनकी बुद्धि में यह तो घुसने से रहा कि उनकी बातों का कोई महत्व है। यह मैं अपने लिए भी सोचता हूँ। मुझे भी पी लेना चाहिए ..   रोज ब रोज मैं अपनी इस अस्थि चर्म वाली देह पर उम्मीद का लबादा लपेटे अपनी ही इच्छा के चरणों में दण्डवत करता हूँ और रोज कहता हूं अब कोई इच्छा नहीं, अब यह उम्मीद का लबादा भी उतार कर दूंगा फेंक या जला दूँगा वैसे जैसे जलाई जाती है देह प्राण उड़ जाने के बाद, लेकिन अगले ही क्षण नया और पुराने लबादे से बेहतर खोजने निकल पड़ता है हूँ। मेरा घर ऐसे अनगिन लबादों से भरा हुआ है लेकिन फिर भी जब जब मैं देखता हूँ कोई नया लबादा मन होता है यह भी तो होना ही चाहिए। इच्छा कोने में खड़ी मुस्कुराती ...

सच की नमी पर समझ की गर्माहट असर नहीं करती

आखिरी बार सम्भवतः 27 अगस्त को डायरी उठाई थी, तबसे सब भुला हुआ था। मैं अब लिखने से कतराने लगा हूँ, विचार आते हैं लेकिन एक अजीब किस्म का आलस्य घेरे रहता है, जाने क्यूँ अब मुझे डर लगता है अपने लिखे से। आज जो कुछ लिखता हूँ, या सोचकर जहाँ तक पहुँचा होता हूँ, तत्काल नहीं भी पता चले पर जब पता चलता है तो सब वैसे ही हुआ रहता है जैसे सोचा होता है, मैं बातों की परत समझ लेता हूँ। फिर मुझे छिपाई या न बताई गई बातों को पचाने में वक़्त लगता है।  खैर.. दिन ठीक-ठाक बीता, कई दिनों बाद आज घण्टों किताबों के साथ बैठा, कुछ काम पूरे हुए, कुछ नए काम बनाए गए। किसी ने कुछ कहा भी नहीं जो चुभे, फिर भी शाम होते होते एक भारीपन उतर आया। यह भारीपन कहाँ से मेरे जहन में तारी होता है मैं समझ ही नहीं पाता। जैसे भीतर कहीं कुछ बुझता जा रहा है। पहले भी ऐसा ही था। अब और अधिक हो गया है। किताब खरीदकर, फूल देखकर, कोई गीत, ग़ज़ल, कविता पढ़ सुनकर वाह करने वाला मैं, अब चुप सा हो गया हूँ, कुछ भी भीतर उत्साह नहीं भरता, लगता है कंधो पर कोई बोझ है जो लगातार बढ़ता जा रहा है। अब कुछ भी करता हूँ पर भीतर कुछ नया किस्म का भाव नही...

जिनमें आवाज़ नहीं है

◆ जिनमें आवाज नहीं है उस दिन मैं देर तक सोचता रहा था। आपने गहरे तक प्रभावित किया। इनकी बात से फलां चीज़ को फलां दृष्टिकोण मिला। हम देखते हैं। मेरा भी मन था पर नहीं कर पाया / पायी ।  समय नहीं मिल पाया। समय कम था। जलन। वो उन लोगों के आसपास रहता है वैसा है नहीं। पता नहीं क्या हो गया है। मित्रों। भाइयों बहनों। दोस्त। आपके अलावा कोई नहीं। देशभक्ति। साधु। महाराज।  मुझसे नहीं हो पा रहा है। अन्तोगत्वा। अन्ततः। ऐसे और कुछ शब्द युग्म जिनसे मैं अब भली भांति परिचित हो चुका हूं अब मैं इनके जाल में नहीं फँसता, जहाँ भी यह उपयोग किए जाते हैं मैं समझ जाता हूँ यहां कुछ तो दिक्कत है। विशेषण, अपवाद, और अति शांत तीनों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।  ***********  गुटों, प्रोफेसरों, नेताओं, अफसरों, विभागों, किताबों,  जातियों, धर्मों, के बीच मनुष्य मर गया, हम सब जिसे देख रहें हैं, हाथ मिला रहें हैं, मुस्कुरा रहें हैं, सब किसी न किसी गुट के हैं, किसी न किसी जाति के हैं, किसी न किसी धर्म के हैं, स्वतंत्र कोई नहीं हैं, शोषकों का विरोध करते करते यह सब खुद शोषक बन गए हैं। इन सब से उ...

कई दिनों की कुछ कुछ बातें

◆ ढेरों अनुभवों से कुछ कुछ बातें जीवन की विसंगति यह है कि विसंगत दिनों में ही हमें सबसे ज्यादा इच्छाएं घेरती हैं, मन हज़ार राह पर चलना चाहता है यह जानते हुए भी कि पाँव सिर्फ दो हैं, हम बहुत कुछ कर लेने की इच्छा से इतना भरे होते हैं कि कुछ भी करते हैं और अपनी ऊर्जा को खपाते हैं। ऐसा क्यूँ है कि जब देह ऊर्जा से भरी होती है तो बुद्धि काम नहीं करती और जब बुद्धि काम करती है तो देह शिथिल हो चुकी होती है।  जाने क्या क्या कर रहा हूँ पता नहीं, बहुत कुछ इसीलिए कर रहा हूँ कि भीतर कुछ न करने के अपराधबोध को कम रख सकूँ। कल शाम पिताजी से बात हुई देर तक बात हुई वो कुछ भावुक किस्म की बातें कर रहें थे। सब ऐसा कहते हैं कि वह ऐसी बातें करते नहीं, पर जाने क्यूँ उन्होंने मुझसे हर तरह की बातें जी हैं, जिसका हमारे ही घर के और लोगों को शायद मेरे बताने पर भरोसा नहीं हो, पिताओं की छवि ऐसी क्यूँ होती है कि वो हमेशा पहाड़ की तरह देखे जाते हैं। मेरे पिता नदी हैं, बालू के नीचे से बहती नदी। उनका स्वास्थ्य थोड़ा खराब है इधर तीन दिनों से मौसमी जुकाम है। इस घर और उस घर हर जगह हाल यही है। कोई गाँठ और कमर दर्द से परेशान ...

अ-लक्षित सा कुछ

◆ जमा-दारी विस्मय, ऊब, खुशी, उदासी, थकन, अ-सम्भव, अर्वाचीन, आत्मीय, साथ, स्पर्श, भरोसा, आँख, पाँव, बारिश, महादेव, गंगा, अनादि, भीड़, हॉर्न, लूटपाट, पान, काशी, नागरी प्रचारिणी सभा, भव्य, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बनारसी दास, साजन मिश्र, सुमन केशरी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, हरिवंश, पूर्वायन चटर्जी,  बद्री नारायण, पंडित कुमार बोस, व्योमेश शुक्ल,  आदि आदि,  सुख, अनुभूति, निश्चिंतता, सगाई, परिवार, नेपथ्य, घबराहट, वापसी, गायब.. कुल यही सब है जीवन में इन दिनों। जिसे विस्तार देने का मन नहीं है। बस इतना कहा जा सकता है कि बहुत कुछ बस स्वीकार करना चाहिए कहना नहीं।  कुछ कुछ शब्द लिखना था पर लिखा एक पूरा वाक्य। कुछ कुछ शब्द में क्या हमेशा कुछ कुछ छूट जाता है ? या हम बस कुछ कुछ ही कह पाते हैं ? इसका ठीक उत्तर क्या है ? हमारे आसपास कहीं भी अल्प, उप, और अर्द्धविराम नहीं है। हम प्रश्नवाचक चिन्ह और पूर्णविराम के बीच घूम रहें हैं। कभी कभी विस्मयादिबोधक चिन्ह से भिड़ंत हो जाती है। और हम वहां भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा देते हैं। हम पूर्णविराम और प्रश्नवाचक चिन्ह एक...

कह देने भर के लिए न कहते हुए..

इन दिनों सब कुछ उन दिनों से बिल्कुल अलग है जिन दिनों हम इन दिनों के विषय में सोचते हुए कहते थे साधन जीवन आसान करेंगे। साधन ने जीवन मुश्किल किया, छिपने के और रास्ते दिए, चोरी के कई कई तरीके, मारने के अनगिन हथियार ऐसे हथियार जो पैने नहीं होते, जो काटते नहीं कुचलते हैं या पीस देते हैं। धोखे बाजी के विकल्प ही विकल्प हैं। इन दिनों कुछ भी गम्भीर नहीं, यह सबसे गम्भीर विषय है।  इन दिनों संवेदनशील शब्द सबसे अधिक असंवेदनशील लोग उपयोग करते हैं। इन दिनों भाषा फूल की पंखुड़ी की तरह नहीं भाले की नोक की तरह चूभते हैं। इन दिनों सबसे कु-कर्मी वही हैं जिन्होंने सुकर्म के पाठ लिखे।  इन्हीं दिनों मैं हर रोज सोचता हूँ शब्दों का साथ छोड़ दूं, और हर रोज कुछ ऐसा घटता है कि शब्द स्वतः झरने लगते हैं मुझसे जैसे जबरन झिंझोड़ने से गिरते हैं पेड़ से कचे पके सारे फल  मैं धीरे धीरे द्वंदों को सुलझा रहा हूँ और उन प्रश्नों के उत्तर की तरफ जा रहा हूँ जो मैं लगभग 20 दिनों से तलाश रहा था। सच बेहद सीधा होता है, चुप्पी या एक भी अतिरिक्त शब्द से सच झूठ हो जाता है। हमें सबसे नहीं बस उस एक व्यक्ति से सच क...

कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता

दिन भर एक पिल्ला अपनी मौत के लिए कलझता रहा। हुंकार भरता, रोता, पेट से जाने क्या निकाल देना चाह रहा था कि पूरी ताकत से बाहर साँस फेंकता रहा। मैं जो पिछले कई दिन से अपना जीवन समाप्त कर लेने का सोचता रहा था कि मेरे भीतर यह बात और गहरी हो गई कि न मौत आसान है न जीवन.. एक तीन महीने का पिल्ला मौत माँगते हुए पूरा दिन दौड़ता रहा अनन्तः रात में उसकी साँस रुकी। पापा और मैंने उसे मिट्टी में दफ़न किया। नहा खा के बैठा था। फिर से नहाया। दीदी रोने लगीं उन्होंने इधर कई दिन से दूध पिला पिला के जिंदा रखा था उसे।  अपने को कुचलने की इच्छा होती है। काश! हम अपनी परछाई पर नहीं खुद पर खड़े हो सकते मैं अब धीरे धीरे कठोर होता जा रहा हूँ, बहुत असमान्य सी घटनाओं पर भी सामान्य सा महसूस होता है बीते दिनों जो जो घटा, कितनी मौतें, कितने बलात्कार, कितनी जातीय हिंसा, कितना धार्मिक उन्माद, यह सब न जाने कैसे असर करता है मन हमेशा एक सा हुआ रहता है। ख़ुशी में बहुत कसकर हँस नहीं पाता। बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिनसे मैं निकल नहीं पा रहा हूँ, तमाम दोमुहें लोगों को देखता हूँ, भीतर अजीब सा कष्ट होता है फिर समझा लेता हूँ...

कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए

एक समय हम जिस स्वभाव के लिए सराहे जाते हैं एक समय के बाद वही स्वभाव काटने लगता है। औरों को जो लगता हो लगता ही होगा ख़ुद को भी आभास होने लगता है कि हम उन जगहों पर अनाधिकृत प्रवेश कर रहें हैं जहाँ सीमित रहना था, बस विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति के लिए भावनाएं असीमित हो, अपने को भूल जाने का बल अधिक हो, अपनी हर इच्छा से पहले उसकी इच्छा की परवाह हो , वहाँ सीमित कैसे रहा जाए, कैसे खुद को सिकोड़ लिया जाए कि किसी को हमारे होने भर की भनक न लगे, कहते हैं आदमी जब दफनाया जाता 6 फिट जमीन लेता है, मैं जीते जी उतने में ही कैद हूँ। अपनी ही भावनाओं पर शर्मिंदा होता हूं, उस भावना पर जिसपर ख़ुश होना चाहिए था, खुला हुआ और जोते खेत की भूर-भूरी मिट्टी का रास्ता बनने की चाह और प्रयास में कब मैं कँटीला बाड़ा बनता चला गया, मुझे समझ ही नहीं आया।  जैसे जैसे मैं दुनिया को देख रहा हूँ, जान रहा हूँ, मुझे यह समझ आ रहा है कि जानना खोने का पहला चरण है। हर आदमी के भीतर वह आदमी है जो उस आदमी के अंदर नहीं होना चाहिए। यह जानते हुए भी कि क्या हमारे लिए ठीक नहीं है आदमी कर रहा है क्योंकि इसमें उसे किक मिल रही है,...

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हैं हम

भीतर अजीब सी उथलपुथल है। मन एक पल को सामान्य नहीं है। कल एक परीक्षा थी। उसके एक दिन पहले से ही मन जैसे बस बैठा जा रहा है। कहने को इतना कुछ है मगर उन्हें कह देना ठीक नहीं है। कल रात मैं देर तक सोच रहा था कि आख़िरी बार कब किसने मुझसे मेरी मर्जी पूछी, शायद किसी ने नहीं, हम योजना में होते होते कब बाहर हो जाता हूँ मुझे खुद पता नहीं चलता। खैर !.. छोड़ देते हैं जैसे सबके बीच मैं छूट जाता हूँ। सुबह बहुत जल्दी उठ गया था कहूँ या कहूँ रातभर नींद ही नहीं आई। सेंटर बगल ही था तो थोड़ा आराम से निकला, बाइक आधे रास्ते में बन्द हो गई, मैं लगातार प्रयास करता रहा मगर स्टार्ट न हुई, न जाने क्यूँ पहले कभी ऐसा होता नहीं था.. थोड़ी दूर पैदल लेकर चला, पैर की चोट से चला नहीं जा रहा था, खून आने लगा तो पसीने से लथपथ हुए वहीं रुक गया, बगल एक दुकान दिखी मगर सुबह 8 बजे कौन मोटरसाइकिल बनाता है, मैं निरीह सा खड़ा रहा, बगल एक बुजुर्ग ने पान की दुकान खोली थी, मुझसे पूछे क्या हुआ बच्चा ? मैं बोला, गाड़ी बन्द हो गई है बाबा चल नहीं रही है परीक्षा देने जाना था, तो बोले चाभी मुझे दे दो, चले जाओ , मैं मिस्त्री क...