हर आम दिन की ही तरह रहा आज का दिन भी और कल की रात भी, रात में और आंख तर होती रही थी। भागकर घर चले जाने का मन होता रहा पर भागना कहाँ हो पाता जब एक बार जीवन जाल में फंस जाओ तो.. अकेले थे। बिल्कुल अकेले। जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। किताबें पढ़ने का प्रयास किया, असफल रहा। उसके बात करने का प्रयास किया, असफल रहा। नींद नहीं आई। सोचा हुआ न हो तो भीतर की सारी ऊर्जा देर तक मेरे साथ तो कई दिनों तक हिली सी रहती है, मैं बता भी नहीं पाता कि मुझे बुरा लग रहा है या मुझे ये चाहिए, दरअसल मुझे क्या चाहिए यह मैं जान ही नहीं पाता। सुबह पैदल दूर तक चलता रहा। सर्द इन दिनों बढ़ी हुई है। गलन से लगता है, नाक कान अँगुलियां कट जाएंगी। पर ऐसी सर्द सुबह में टहलना मुझे बहुत पसंद है, बड़ी नीरवता रहती है, आसपास धुंध के अलावा कुछ नहीं होते, इन दिनों कुत्ते के छोटे छोटे बच्चे टहलते रहते हैं, उनके साथ खेल लेता हूँ, एक ही तरह से बना हुआ मुँह कुछ पल को इधर उधर हो लेता है। दोपहर तक सोचता रहा कोई तो नए वर्ष पर फोन कर दे, नहीं आया तो खुद ही कर दिया। उसे ही जिसे कर सकता हूँ बिना झिझक। आज दिनों बाद मुझे लगा कि मैं ...