बीते तीन दिन बिस्तर पकड़े बीत गया, बुखार और सर्दी ने जो हाल किया है कि पूछो मत। आज गले से कुछ आवाज निकल रही थी, इन दिनों में बस एक मौन स्वर में पुकारता रहा कि काश कोई तो कुछ घड़ी बैठे मेरे सिरहाने, पर यहाँ इस शहर में अकेले पड़ा हूँ, कभी कभी सोचता हूँ, कहीं किसी दिन ऐसे मर गया तो लोगों को पता भी बड़ा देर से ही चलेगा। कहने को इतना.. ख़ैर
सारे जतन किए जिससे जितना जल्दी ठीक हो सकूँ हो जाऊँ पर यह सही होने का नाम नहीं ले रहा, आज दोपहर में बुखार यूँ था की देह काँप रही थी। इन दिनों में कुछ नहीं किया बस बिस्तर पकड़े पड़ा रहा, कुछ कविता संग्रह पलटता रहा, कुछ कहानी पढ़ी, दो फिल्में देखी, 'बारामुला' और 'स्कारफेस'.. दोनों अपने आप में अपने कॉन्सेप्ट में अदभुत हैं। कश्मीरी पंडितों पर हुई बर्बरता को बारामुला में जिस ढंग से दिखाया गया है वो बिल्कुल नए ढंग का है, बिल्कुल कसा हुआ निर्देशन, मन काँप के रह जाता है। स्कारफेस 80 के दशक में क्यूबा शहर के शरणार्थियों और ड्रग माफिया गैंग की कहानी है, फ़िल्म में अल पचिनो ने अपूर्व काम किया है, उनके हाव भाव से दहशत भरती है वह देर तक रहती है।
आज दिन भर कुछ नहीं किया। बस पड़ा रहा, कांपता खाँसता, ऊब मिटाने को कुछ घड़ी बाहर निकला था, पर मिटी नहीं। हर जगह इतने सवाल हैं इतनी परत की समझ ही नहीं आता कौन सी परत है जीवन कौन सी परत भ्रम...
आने के बाद देर तक मां से बात किया। कुछ नाश्ता बनाया और बस। मन जाने क्या सोच रहा है, मुझे बिल्कुल वैसे ही महसूस हो रहा है जैसे कोई बच्चा कहीं जाने को खुब मन से तैयार हुआ हो और आखिर के क्षण में उससे कहा जाए तुम्हारे लायक जगह नहीं है। भीतर जैसे कुछ बहुमूल्य सा खोने का अहसास है। शायद जानता हूँ शायद नहीं..
हम अपने आप को इतना कम्प्रेस करते हैं कि एक दिन हम वह बचते ही नहीं जो हम असल में होते हैं।
हर इच्छा पर अनिच्छा का लेबल लटकाकर संस्कारी बनने का ढोंग करते हुए हम झूठा जीवन जीने को शापित हैं।
शाम यह पंक्ति हुई.. अचानक से मेरी आत्मा में उमड़ी इसका क्या अर्थ है पता नहीं.. मगर यह कविता हो सकती है।
|| जब जब भी दिखा खुला दरवाजा
एहतियातन बन्द कर दिया
जाने क्यूँ
कभी यह ख़्याल ही नहीं आया
कि यह रास्ता हो सकता है
भागने का ||
हम कितना कुछ का अर्थ ही नहीं जानते हैं फिर भी वो अपने अर्थ के साथ बना हुआ है, बिल्कुल अनचीन्हे, बिल्कुल नए रूप में
― 18 नवंबर 2025
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