मैं अपना सब लूटा देने के बाद भी नहीं चाहता हूँ कि कोई मेरे लिए कुछ करे, जब कोई कुछ कर देता है तो भीतर अजीब सा कुछ होता है लगता है मेरा दिल बैठा जा रहा है। मुझे अपने आसपास के हर व्यक्ति के लिए बस करना पसंद है। उनसे मुझे बदले में कुछ नहीं चाहिए। दर'असल मैं स्वीकार नहीं कर पाता की कोई मेरे लिए भी सोच सकता है। पिछले कई महीनों से मैं अपने को देख रहा हूँ जब भी कोई कुछ मेरे लिए कर देता है मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ, मैं समझ ही नहीं पाता इसे कैसे स्वीकार करूँ.. जबकि ऐसा नहीं है कि मुझे चाहिए नहीं वह, प्रेम भला किसे नहीं चाहिए। यह किस चीज़ का अ-स्वीकार है यह मैं नहीं जानता, सम्भवतः यह ख़ुद का ही नकार है, मैंने वर्षों तक अपना मन दबाया अपने को हर जगह पीछे रखा अब जब कोई कुछ करता है तो मन स्वीकार ही नहीं पाता। यह पहले ही मैं कहीं कह चुका हूँ कि प्रेम तर्क का नहीं स्वीकार्यता का विषय है, मगर स्वीकार्यता त्वरित नहीं आती, वह चरणों में आती है, पूर्ण स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए पूर्ण नकार तक जाना पड़ता है। मैं कहाँ हूँ पता नहीं.. ************* आज दिन यात्रा में गुजरा उसका शहर छोड़ रहा था तो लग रहा था ज...