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जीवन अभी झरना शेष है

मैं अपना सब लूटा देने के बाद भी नहीं चाहता हूँ कि कोई मेरे लिए कुछ करे, जब कोई कुछ कर देता है तो भीतर अजीब सा कुछ होता है लगता है मेरा दिल बैठा जा रहा है। मुझे अपने आसपास के हर व्यक्ति के लिए बस करना पसंद है। उनसे मुझे बदले में कुछ नहीं चाहिए। दर'असल मैं स्वीकार नहीं कर पाता की कोई मेरे लिए भी सोच सकता है। पिछले कई महीनों से मैं अपने को देख रहा हूँ जब भी कोई कुछ मेरे लिए कर देता है मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ, मैं समझ ही नहीं पाता इसे कैसे स्वीकार करूँ.. जबकि ऐसा नहीं है कि मुझे चाहिए नहीं वह, प्रेम भला किसे नहीं चाहिए। यह किस चीज़ का अ-स्वीकार है यह मैं नहीं जानता, सम्भवतः यह ख़ुद का ही नकार है, मैंने वर्षों तक अपना मन दबाया अपने को हर जगह पीछे रखा अब जब कोई कुछ करता है तो मन स्वीकार ही नहीं पाता। यह पहले ही मैं कहीं कह चुका हूँ कि प्रेम तर्क का नहीं स्वीकार्यता का विषय है, मगर स्वीकार्यता त्वरित नहीं आती, वह चरणों में आती है, पूर्ण स्वीकार्यता प्राप्त करने के लिए पूर्ण नकार तक जाना पड़ता है। मैं कहाँ हूँ पता नहीं.. ************* आज दिन यात्रा में गुजरा उसका शहर छोड़ रहा था तो लग रहा था ज...

खुशी के शब्द

घर एक व्यक्ति है ! यह पंक्ति पहली बार जिसने भी कहा उसकी अनुभूति क्षमता को नमन करने का मन करता है। कितनी बड़ी बात, कितनी बड़ी अनुभूति को बस चार शब्द में कह देना कितनी बड़ी उपलब्धि है।  प्रतीक्षा से उपजा घाव प्रतीक्षित व्यक्ति के एक स्पर्श मात्र से भर जाता है। जीवन आज जीवन की तरह महसूस हुआ। इससे ज्यादा क्या कहूँ ? और कैसे ? ख़ुशी को व्यक्त करने के लिए हमारे शब्दकोश सिमट जाते हैं। हम जीने में इतने तल्लीन होते हैं कि कोई गैप ही नहीं बन पाता जो बात हृदय से आगे मस्तिष्क तक जा पाए।  लग रहा है वातावरण में नमी बढ़ गयी है। मन कही सिमट जाने को है..मगर मन का जीवन तो पल भर का ही होता है न ! हम आज 34 दिन के बाद कुल 2 घण्टे 40 मिनट साथ रहे। घूमते रहे। दुनिया में हमारे भर की जगह कहाँ हैं और पल तो एक पल में बीत गया। अब जो है वह अगले ऐसे किसी पल का इंतज़ार है.. कुछ तारीखें सहेज लेने लायक होती हैं। सहेज़ लिया।  ― आशुतोष प्रसिद्ध  27 दिसम्बर 2024 / 6: 15 शाम 

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

सुबह झाड़ू उठाया तो पहले रोया। इसी के लिए मैं कितना खीझा लेता था दीदी को, यहाँ साफ़ नहीं है, यहाँ जाला लगा है ये सही से रखो.. अब किससे कहूँ ? ख़ुद से ? ख़ुद से आख़िर कितनी बात की जा सकती है। इसे कैसे घर कहूँ मैं समझ ही नहीं पाता.. मेरा तो वैसे भी सब छितराया हुआ है। न यहाँ का हूं.. न कहीं का.. जबसे जन्म हुआ है दो बड़ी बहनों के साथ रहा, मुझे हमेशा लगा मेरी तीन माँ हैं, अपने से ज्यादा मेरे लिए परेशान रहती, परवाह करने वाला कोई कितनी बड़ी नेमत है ईश्वर की यह हम तब महसूस पाते हैं जब कोई नहीं बचता... अभी उस दिन दीदी को बस पता चल गया था कि मुझे.....वो तब तक रोईं जब तक मैं उनको जाकर गले नहीं लगा लिया। मुझे तो पहले लगता था बड़की दीदी ही पगली हैं अब लग रहा है दोनों एक ही तरह हैं.. साड़ी पहन के खड़ी होती हैं तो लगता है मां अपने यौवन के दिनों में लौट आई हैं।  मेरी दादी भी दीदी ही थी। हमको दादी ने नहीं, इन्हीं दो बहनों ने रात रात भर कहानी सुनायी है। कई काम तो उनपर टाल देता था, अब तो एक ग्लास पानी देने वाला भी कोई नहीं है। न सुबह चाय का ग्लास पकड़े एक एक फूल देखते बतियाने वाला कोई.. मैं वैसे ही ब-मुश्किल बो...