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द्वंद्व ही द्वंद्व का उत्तर है।

मन बड़ा व्यसनी है। मन धूर्त है। मन बहानेबाज है। मन सहारा ख़ोजता है। मन बिल्कुल उस आदमी की तरह है जो बैठते ही आधा लेट जाने का प्रयास करता है। यह सब वाक्य मेरे नहीं हैं मेरे पिताजी के हैं। परसों की रात फोन करके रोने लगे। उन्हें मेरी याद आ रही थी। जैसे जैसे उनकी उम्र बढ़ रही है ( यह लिखते हुए मुझे इतना डर लग रहा है कि मेरी आँख भरी हुई है। बाईँ आँख ) वो और भावुक होते जा रहे हैं। मैं उनका सेम टू सेम कॉपी हूँ। लगभग वही स्वभाव है बस वो ज्यादा कामकाजी और दृढ़निश्चयी आदमी हैं, मैं नहीं, मैं आलसी हूँ। मैंने बिना बताए बस पकड़ा और उनके सामने खड़ा हो गया अगले कुछ घण्टे बाद, मुझे देखते ही भईया बोलकर सीने से कस लिया और रोने लगे, पूछ रहें हैं उसे क्यूँ नहीं लाए, मैंने कारण बताया, बैठे, मुझे ऐसे दुलारते रहे जैसे गाय अपने नवजात बच्चे को दुलारती हैं, मैंने फोन किया और पकड़ा दिया, पापा मुश्किल से दो शब्द बोले होंगे और फिर रो पड़े, उनकी आँखों में ऐसे आसूँ मैंने बाबा के मरने पर देखा था। जब वो दालान वाले कमरे के दरवाजे का एक पल्ला पकड़ कर बस फफक फफक कर रो रहे थे। आदित्य की मृत्यु पर तो जैसे पत्थर हो गए थे...