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सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

तरह तरह की बात है। हर मुद्दे पर, हर विचार पर विचार है। हर क्रिया के लिए है हमारे पास प्रतिक्रिया, मगर अपनी बात करनी हो तो सब विचार, सारा खुलापन, सारी कल्पना शक्ति वाक्पटुता सब न जाने कहाँ गुम हो जाता है। सब कुछ है मगर जैसे कुछ नहीं है, मन कहने से पहले सोचना पड़ता है इसे कहने के बाद क्या समझा जाऊँगा? यह सोचते ही यह भी सोचता हूँ कि क्या यह उचित है ? जवाब ही नहीं मिलता। एक संकोच लिए घूमता रहता हूँ, जो कहना चाहता हूँ कह नहीं पाता, मान लो कभी कह भी दिया तो क्या शर्त है कि वह पूरा होगा, उलट गलत समझ लिया गया तो। मैं यही सब सोचते हुए यह भी सोचता हूँ कि जिस भी रिश्ते में इतना सोचना पड़े उस रिश्ते की बुनियाद क्या मजबूत है ? जवाब नहीं में ही मिलता है। बुनियाद मजबूत कैसे होगी ? वैसे ही रहने से जैसे हम हैं, वही कहने, बोलने और दिखने से जो हम कहना चाहते हैं, समान्य रूप में बोलते हैं और जैसे असल रूप में दिखते हैं.. परिवार हो या प्यार अगर आप खुलकर मन नहीं कह पा रहे तो मन से वहाँ हैं ही नहीं.. * कितना कुछ अर्थपूर्ण दिखकर बे-अर्थ है और कितना कुछ बेअर्थ दिखकर है अर्थपूर्ण। सोचने की स...