*
कितना कुछ अर्थपूर्ण दिखकर बे-अर्थ है और कितना कुछ बेअर्थ दिखकर है अर्थपूर्ण। सोचने की सीमा क्या है ? तटस्थता तक बस ? क्या उसके बाद सोचना नहीं होता, तटस्थ आदमी तो और ज्यादा सोचता होगा। तटस्थ रहने के लिए प्रतिक्रिया देने से अधिक सूझ और संयम लगता है। कहाँ से लाता होगा अंतर में जूझता आदमी ? वह अपने से लड़ता होगा ? लड़ता ही होगा। और विकल्प नहीं है। क्योंकि न क्रोध मरता है न प्रेम न वासना न साधुता। जिसमें जो है वह रहेगी। सब यहीं उर्जा रूप में घूमता रहता है। दबा देने से तत्काल शांत हो सकता है। बाद वह उभरता है। और फिर पहली बार से घातक उभरता है फिर जिस ऊर्जा से कुछ सुंदर हो सकता था वह विध्वंसक होकर लौटती है। दबी भावनाएँ हों या दबे बीज जब उन्हें उचित और अनुकूल मौसम मिलता है तो वह शिला फाड़कर भी फूट पड़ते हैं।
सुबह से मैं दो शब्दों को तोल रहा हूँ। और बार बार दोनों के दोनों बराबर हो जा रहे हैं, न कोई भारी हो रहा है न हल्का। मैंने कभी इन्हीं शब्दों की आड़ ले किसी को आसूँ दिया था। अब वही शब्द मेरे सामने खड़े हैं मुँह बाए । मैं कुछ नहीं कर सकता मुझे उस खुले मुँह का निवाला ही बनना होगा। बन जाऊँगा। स्वीकार में दुःख कम है। यूँ भी इतना भर गया हूँ कि अब कुछ भी आए बस यही निकलता है बगल रख दो। यह भी बगल रख लिया। उठूँगा तो बस उठ जाऊंगा सारी पोटली छोड़कर। मैं सामान लेकर यात्रा नहीं कर पाता। यात्रा से याद आया मेरी बड़ी इच्छा है मैं कहीं यात्रा पर निकल जाऊँ कुछ दिनों को सब छोड़कर.. वैसे जैसे मरने पर आदमी चला जाता है सब छोड़कर बिना इस बात की फ़िक्र किए की फोन चार्ज है या नहीं, कपड़े भीतर हैं या बाहर, कल चाय पीने भर का पैसा है कि नहीं.. कौन रोयेगा, कौन खोजेगा, सारी चिंता उतार कर खाली हाथ, बस देह पर पड़ा एक कपड़ा पहने.. आगे राह ही राह बतायेगी। पापा से यही बात कह दूं फिर देखो... अब दो दो जिम्मेदारी है भागना या चले जाना तो ईश्वर ने छीन लिया। ख़ैर ठीक है...
*
रात घण्टों मम्मी पापा से बतियाता रहा, उन्हें समझाता रहा, वो कितना समझे पता नहीं मैं बहुत कुछ समझ जाता हूँ , मैं ऐसे ही समझता हूं। कभी कभी यह भी सोचता हूँ उन्होंने हमारे लिए अपना मन जितना मारा, जितना त्याग किया, जितना खुद को बदला क्या हम उनके त्याग के प्रति ईमानदार हैं, हम उनके बदलाव को एप्रिशिएट कर रहें हैं या नहीं ? हम नहीं करते, हम उनके बदलावों पर ध्यान नहीं देते। मां बाप का मन माँ बाप बने बिना नहीं समझा जा सकता है। हँसते हँसते सोए यह मन में देर तक रहा। यहीं लगता है जीवन किसी योग्य है।
*
सुबह आलस्य घेरे रहा बैठा रहा बिस्तर पर, इधर उधर कुछ कुछ पढ़ता रहा। दोपहर सब साफ सफाई की कूलर चलाने के क्रम में घण्टों व्यस्त रहा। सस्ती चीजें महंगी ही पड़ती है।
शाम सोचा बाहर निकलूँ फिर समझ नहीं आया कहाँ जाऊँगा। कोई काम भी तो नहीं है सब तो है। बैठा रहा।
जब शहर में आया तो शहर अ-परिचित था, कुछ लोग परिचित थे। अब लोग अ-परिचित हैं शहर जाना पहचाना है। कई जगहें हैं जहाँ घण्टों बैठा जा सकता है। ऐसी भी जगहें हैं जहाँ खड़े होने के लिए अच्छी खासी हिम्मत करनी पड़ती है। कभी कभी कर लेता हूँ।
एक शब्द हैं क्रेविंग उसका हिंदी क्या होगा पता नहीं, शायद छटपटाहट, स्मृति की, छू लेने, देखने की, होने का आभास कर लेने की क्रेविंग, यह जब होती है तो यह शहर अंधेरे भरा लगता है। लगता है कहीं कदम बढ़ाऊंगा तो गिर पडूंगा। कहीं कोई भी नहीं। जिसे कहा जा सके ' नीचे आइए जरा दो मिनट को '
खैर ! समय यही है।
ये तो इन दिनों जड़ से ही शाखा देते पेड़ चलन में है, वरना पेड़ वही बेहतर माना जाता है जो जमीन से सीधा ऊपर जाए वहां शाखा फोड़े।
विस्तृत छाया देने के लिए हमें जमीन पर फैलने से बचना होता है।
समझ, समय निकलने के बाद ही क्यूँ आती है? ईतनी धीमी गति क्यूँ है उसकी ? कोई गाड़ी दो भाई उसे..
― 27 मार्च 2025 शाम 8 : 20
🌼🌼
जवाब देंहटाएं