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चले जाने का चले जाना

'वो मिलकर चले गए' इस वाक्य में मिलने पर जोर दूँ या चले गए पर ? चले जाने से क्यूँ चला जाता है मिलने का सुख ? कौन छूटता है दो लोगों के मिलने पर और चले जाने पर ? मिलने आने वाला या मिलकर चले जाने वाला ? जो भी छूटता है वह कैसे रहता है अकेले ? मेरी तरह तो नहीं रहता, हर शय में उसे ही तलाशता हुआ। वही जो चला गया। जिसका जाना आने से पहले तय रहता है। जिसपर मेरा पूरा अधिकार है और कोई अधिकार नहीं। जिसे छू सकने का सामर्थ्य मुझमें आजतक नहीं, वो मुझे छुए इतना भाग्यशाली तो मैं हूँ नहीं। हम अधूरी इच्छा ही नहीं अधूरी छुवन से भी भरे हुए हैं। हम पर इतना दबाब है कि हम जब जब फटते हैं रो पड़ते हैं। हमारे ज्वालामुखी का केंद्र आँख है और लावा वह आसूँ जो उससे फूट पड़ता है। यह बेहद गर्म होते हैं। यह दुःख के आँसू होते हैं। दुःख के आँसू गर्म होते हैं। ग्लानि के ठण्डे। 

इतने सालों में मैंने एक बात गौर की जब जब मुझे रोना आता है मेरी बाईं आँख से आसूँ पहले गिरता है दायीं आँख से बाद में। ऐसा क्यूँ पता नहीं । मगर ऐसा है। मेरे भीतर की स्त्री दाहिने क्यूँ नहीं होती। अब स्त्रियों को अपनी जगह बदल लेनी चाहिए वह वामांगी से दाएँ भाग में आएं। वो कठोर हों। 

रात सपनों से भरी थी । थोड़े सुख ज्यादा ग्लानि से भरी थी। अपने को लेकर संदेह से भर गया हूं। क्या मुझे कोई शऊर नहीं। क्या मैं सुख देने योग्य ही नहीं । या मेरे मन में कोई खोट है जो मैं जीवनद्वार तक जाकर प्यासा लौट आता हूँ। क्यूँ रोक दिया जाता है मुझे ? क्यूँ रोक लिया जाता है ख़ुद को। कौन है जो हमारे घर में झांक रहा है। 

काश! ईश्वर उसकी आंख फोड़ देता। 

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टेबल लैम्प पुस्तक से दो और लेख पढ़े। रेणु के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ गया तो उसे रिकॉर्ड किया। पिताजी को ट्रेन पकड़वाया। उन्हें बात करना बड़ा पसंद है। मैं समझ नहीं पाता जवाब क्या दूँ। क्रिकेट और राजनीति से मैं बिल्कुल दूर ही रहता हूँ। कभी रुचि ही नहीं हुई। हम कहे आपका वजन घट गया है तो कह रहे थे 'नाहि पिछली बार से 2 किलो बढ़ा बा ' हम बोले गाल काहें धंसा जा रहा है, तो कहे अरे ऊ सब होत जात रहत थय, लौटते हुए घण्टे भर से ज्यादा जाम में फंसा रहा। सर पर धूप लगी। अब बाहर गर्मी सा मौसम है यूँ लगता ही नहीं यह मार्च है लगता है मई की शुरुआत है। पसीने से तरबतर हुआ। लौटा। पड़ा रहा कुछ देर। आज व्रत है। कुछ खाने का मन नहीं हुआ। 

सुबह से एक कागज बार बार निहारे जा रहा हूँ। उसमें समय लिखा है। 9:18। मेरा समय वही है। 

― 4 मार्च 2025 / 5 बजे शाम

काश ! किसी रोज अचानक तू आए और इतनी तैयारी से आए की मेरे भीतर यह भय एक बार को भी न आए कि यह आना कुछ पल है। मैं फिर रह जाऊँगा अकेले। तुम रहो। जैसे घरों में रहा जाता है। चीजें उल्टो पलटो बदलो बनाओ अपने अनुरूप करो सब और फिर मुझसे कहो अब आप इस घर में तमीज़ से रहेंगे। समय से सोना जागना है। समय से आना जाना। जिससे मैं तुम्हारे आकर जाने से नहीं अपने लिए डरा रहूँ कि कहीं निकाल न दिया जाऊँ तुम्हारी दुनिया से..

अब आओ तो न जाने के लिए आना । इस आने जाने में मेरे भीतर एक आग जलती है जो मेरे चित्त की अपनी आँच जिन्दा रखती है। 

― 10 : 20 रात 


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