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उस तरफ जाने से पहले

हम भरे होते हैं कि अभी फलाँ व्यक्ति सामने पड़े तो बताऊं।  ढ़ेरों तर्क़ लगभग उतने ही सवाल जवाब लिए भीतर से बिल्कुल तने खड़े रहते हैं कि बस अबकी सब कह देंगे। अचानक उस चेहरे को देखते हैं जिसपर सिवा पसीजने के और कुछ किया ही नहीं जा सकता। हम बिल्कुल चौंक जाते हैं। हमें नहीं समझ आता यहाँ क्या करना है, कैसे पेश आना है। यह कितना अजीब है न कि हम दूर से कहीं की परिस्थितियों को बस सोच सकते हैं। किसी के मन को मनगढ़ंत सोच सकते हैं। सामने सब बिल्कुल अलग होता है। वास्तविकता से टकराते ही हमारे ख़्वाब के घर नींव सहित उखड़ जाते हैं। और हम असहाय हो खड़े हो जाते हैं। आम आदमी का हाल कुरुक्षेत्र में खड़े उस द्रोण की तरह है जो युधिष्ठिर के मुँह से 'नरो या कुंजरो' सुनकर अपना सब कहा सुना भूलकर हताश हो गया था। हम सब द्रोण ही हैं, हम सब एक अश्वत्थामा पाल रहें हैं। 

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लगभग बातों पर मैं लगभग बचता रहता हूँ। जहाँ बहुत कुछ कहने की जरूरत होती है वहाँ कुछ कुछ कहकर बच लेता हूँ। रिश्तों को बचाए रखने के लिए कुछ घावों को रिसते रहने देना होता है और कुछ पर बकायदा मलहम पट्टी कर उसे ठीक कर देना होता है, यह मुझे अब समझ आता है की क्यूँ । भारतीय समाजिक संरचना जिस तरह ही है उसपर जितना वाद विवाद किया जाए कम है। हम न चाहकर भी वह बन जाते हैं जिसका हम विरोध करते हैं। हम यथास्थिति वाद से प्रभावित हैं हमें कुछ और प्रभावित ही नहीं कर पाता। ख़ैर !

मैं लगभग हर बार अपने को एक याचक की तरह पाता हूँ कहीं किसी से मांगता हूं कि वह अपना ख्याल रखें, कहीं दूसरे से मांगता हूं वह नहीं रख रहें तो कृपया तुम ही उनका ख्याल रखो। भाई बनता हूँ तो बहनों की खैरियत और खुशी मांगता हूँ बदले में उनसे दूरी चुन लेता हूँ, बेटा बनता हूँ तो माँ बाप का स्वास्थ्य और लंबी उम्र, पति या प्रेमी बनता हूँ तो साथ मांगता हूँ, सहजता माँगता हूँ, स्वीकार्यता माँगता हूँ। मैं हर जगह बस माँग रहा हूँ। कभी कभी सोचता हूँ क्या मुझे भी कोई माँग रहा.. मेरे लिए भी कुछ मांगा जा रहा या मैं यूँ ही माँगते देते हर जगह हर दिन घटते हुए ही मर जाऊँगा। 

कल की रात कल का दिन दोनों अच्छे नहीं थे। रात संकोच अनिद्रा और अपने को समेटते बीती। पिताजी से मिलने की बड़ी इच्छा थी। फोन करता रहा, घर पहुँचने तक। एक एक चीज़ देखता पूछता रहा पर जा नहीं पाया उनके पास। सुबह देर तक खुद पर चिड़चिड़ाता रहा । पर अपने से कब तक लड़ा जा सकता है। 

दवा खाने दिखा लेने की ज़िद करता रहा। सब बेअसर रहा। अनुशंसा करनी पड़ी। अंततः हुआ। 

दीदी को लेने गया था। ले आया। शाम से सिर में बेहद दर्द है। फिर भी हँसता बोलता रहा कि उस आँसू पर कुछ हँसी हावी हो। देर तक वहीं था। खाना खाकर लौटा। पिताजी भी देर से घर पहुँचे। सुबह सुबह मैं भी जाऊँगा। इस बार मैं रंग नहीं लगाऊंगा। कल ख़ूब डाँट खाया था इसीलिए छोटी बहन से, कुछ बोल नहीं सका। मैं ऐसी स्थिति में बस हँसता हूँ। ऐसे ही करके अपना मन छिपा पाता हूँ। परिवार से दूर रहो तो मन होता है बस किस रूप में पहुँच जाओ। फिर भी नहीं ही पहुँच पाता। विनोद कुमार शुक्ल की तरह कहूँ तो मैं हर कहीं पीछे छूट रहा हूँ। 

शाम एक अजनबी कॉल आया। उन्होंने कहा पहचाना ? मैं नहीं कह पाया नहीं, और बात करता रहा, लगभग 10 मिनट बात हुई। उनका पढ़ना लिखना परिवार जीवन सब पूछ लिया। अंत तक मैं नहीं जान पाया कौन है वह जो उस पार इस प्रेम से मुझसे बात कर रहा। मुझे याद नहीं रहता कुछ। मैं कौन हूं मैं यह भी नहीं जानता । वह तो कहती भी है आप कभी अपने को प्राथमिकता में नहीं रखते। मैं खुद को क्यूँ रखूं प्राथमिकता में.. वो जिन्हें मैं अपना कहता हूँ वह क्या करेंगे फिर..? 

ख़ैर ! 

कुछ पढ़ा लिखा नहीं। अब पढ़ूँगा भी नहीं। मन कर रहा है कहीं कोई कोना मिल जाए तो धँस जाऊँ वहीं.. तुम्हारे सीने से लगने को तो मिलना है नहीं। बेड के नीचे ही.... !  शायद कुछ घड़ी को ठीक लगे। 


― 12 मार्च 2025/ रात 11 बजे 

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