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इच्छाओं का संत्रास

इच्छाएँ बेघर होतीं हैं, उन्हें जहाँ भी चार दीवार और एक छत का आसरा दिखता है, वो वहीं टिक जाना चाहती हैं,  मनुष्य का मन इच्छाओं का पहला घर है , चारों तरफ भटकने के बाद पहली बार उसे मनुष्य ही अपने रहने योग्य लगा। वहाँ जब रहना शुरू किया तो इच्छा के भीतर भी एक इच्छा पैदा हुई, उस घर को अपने अनुरूप करने का।  वह दिन बा दिन पाँव फैलाती गयी और एक दिन उसका पाँव इतना फैल गया कि उसे एक देह कम लगने लगी, फिर उसने लगातार मंथरा की तरह पहली वाली देह का कान भरा कि अरे तुम तो एक दूसरी देह के बिना अपूर्ण हो, प्रेम के बिना तो बिल्कुल ही बेकार, बाहरी साज सज्जा तो बहुत ही जरूरी है, और फिर शुरू हुआ यह खेल जो आज हम आप देख रहें हैं।  एक देह ने एक और देह खोजा, उसके भीतर अपने भीतर की इच्छा को पाँव पसारने के लिए जगह बनाया, और उस देह के भीतर की इच्छा को अपने भीतर पाँव पसारने की जगह दी। अब एक देह में कई इच्छाओं ने घर बना लिया। इन इच्छाओं की आपस में पटती नहीं है, पटे भी कैसे, जैसे हर मनुष्य की एक नियति है वैसे ही हर इच्छा की भी, इच्छाओं की उम्र अनिश्चित होती है, कुछ तो वह जन्म लेते...