हम अपना हृदय शब्दों के सहयोग से दर्पण की तरह खोलकर रख देते हैं, वो हूबहू तो नहीं मगर मन के आसपास तक पहुँचता हुआ लगता है, जिससे कहना है उसे कह देते हैं, फिर जब वो उन पीड़ाओं से दुःखी हो उठता है तो भीतर से ग्लानि पनपती है, अपने ही ऊपर क्रोध फूटता है, मन कितना अजीब होता है न ? वह चाहता है कि उसका प्रिय यह भी जाने उसके पीछे छूटा व्यक्ति उसे कैसे याद कर रहा है उसकी अनुपस्थिति को कैसे जी रहा है, उल्टा यह भी चाहता है कि उसका प्रिय हमेशा हँसता रहे उसे तनिक भी दुःख न हो, दुःख शब्द का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाए उसके जीवन से..पर यह दुःख है की वह हमेशा किसी न किसी के सहारे चिपका रहता है, दुःख परजीवी है, वह अपने जीवन के लिए हमारा जीवन खाता है धीरे धीरे हम रोते है तो आँसू वही पीता है और बढ़ता रहता भीतर.. ऐसे लोग कितने किस्मत वाले हैं जिनके लिए कहीं कोई राह देख रहा है, जिनके लिए कोई मन सोच रहा है, वो कैसे होंगे जिन्हें कोई सोचता ही नहीं होगा, ऐसे लोग तो होंगे ही न जीवन में ? मन को मनभर कह जाने के बाद लगता है क्या मैं ही इतना सोचता हूँ, इतनी भावनाओं का जवाब केवल चुप्पी कैसे हो सकती है? बोल जाने के बाद लगता...