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याद नहीं रहने की याद

अपने को भूलकर ही अपनों के बीच जिया जा सकता है। मैं जानता हूँ इस वाक्य के बाद आपके पास कई तर्क होंगे, जैसे सबसे सस्ता वाला होगा कि अपने जो होंगे वो आपको भूलने ही नहीं देंगे की आप क्या हैं, पर मेरा भरोसा कीजिए आप एक दिन इसी वाक्य के साथ सबसे बुरी तरह परास्त होंगे उस दिन आपको यह आभास होगा कि हर दूसरा व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के साथ मस्त है, आप की अनुपस्थिति कहीं खटक नहीं रही है, हर व्यक्ति की अनुपस्थिति को भरने के लिए कोई न कोई उपस्थित है। दरअसल मामला सबसे सरल यह है कि आप समझें जिसके जीवन में बहुत करीबी हैं, उसके लिए कोई भी करीबी नहीं है, सब एक निमित्त मात्र हैं, जब जो जरूरत होगी वह करीबी होगा, फिर उस करीबी के जीवन में क्या चल रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता... कई उदाहरण हैं  मगर ख़ैर छोड़िए.. ************ जबसे जन्म हुआ है, जीवन यहीं जन्मभूमि से 150 किलोमीटर के दायरे में सिमट गया है। कभी कहीं बाहर गया भी तो मजबूरन या परीक्षा के सिलसिले में, बाहर जाने का मन करता रहा पर मन ही बाहर गया मैं न अभी हरिद्वार जा सका, न उज्जैन, न दक्षिण में कहीं जा पाया , न मध्य में, न पूर्व में ही कहीं, केदारन...