अपने को भूलकर ही अपनों के बीच जिया जा सकता है। मैं जानता हूँ इस वाक्य के बाद आपके पास कई तर्क होंगे, जैसे सबसे सस्ता वाला होगा कि अपने जो होंगे वो आपको भूलने ही नहीं देंगे की आप क्या हैं, पर मेरा भरोसा कीजिए आप एक दिन इसी वाक्य के साथ सबसे बुरी तरह परास्त होंगे उस दिन आपको यह आभास होगा कि हर दूसरा व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के साथ मस्त है, आप की अनुपस्थिति कहीं खटक नहीं रही है, हर व्यक्ति की अनुपस्थिति को भरने के लिए कोई न कोई उपस्थित है। दरअसल मामला सबसे सरल यह है कि आप समझें जिसके जीवन में बहुत करीबी हैं, उसके लिए कोई भी करीबी नहीं है, सब एक निमित्त मात्र हैं, जब जो जरूरत होगी वह करीबी होगा, फिर उस करीबी के जीवन में क्या चल रहा है उससे कोई मतलब नहीं होता... कई उदाहरण हैं मगर ख़ैर छोड़िए..
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जबसे जन्म हुआ है, जीवन यहीं जन्मभूमि से 150 किलोमीटर के दायरे में सिमट गया है। कभी कहीं बाहर गया भी तो मजबूरन या परीक्षा के सिलसिले में, बाहर जाने का मन करता रहा पर मन ही बाहर गया मैं न अभी हरिद्वार जा सका, न उज्जैन, न दक्षिण में कहीं जा पाया , न मध्य में, न पूर्व में ही कहीं, केदारनाथ तो सपने की बात है.. जन्मते से कान में राम नाम जाता रहा पर रामजन्मभूमि का दर्शन आज नसीब हुआ.. अभी न हुआ होता तो बिल्कुल बुरा न होता, मुझे अब इंतज़ार के दौरान का धैर्य आ गया है, मैं एक जगह पर बिना उठे, बिना हिले घण्टों बैठा रहा सकता हूँ।
मैं जीवन को उतना ही देखना चाहता हूं जितने में अपनों का साथ हो वरना यूँ अपने लिए जिंदा तो सुअर भी रहती है। मन के व्यक्ति के बिना मैं इस दुनिया का सर्वोत्तम सुख भी ठुकरा दूँ , मैं स्वीकार भी कर लूंगा तो जियूँगा कैसे उसे उसके बिना..
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मंदिर में न सुकून है न पल की शांति निरर्थक शोर है, मंदिर के विषय में जिस ऊर्जा की बात होती है, वह इस धरती से चली गई, अब बस बड़े बड़े आलीशान भवन हैं, पंडे पुजारी हैं जो प्रसाद चढ़ाते रहते हैं अपने से छोटे को गरियाते रहते हैं, ईश्वर को बेचकर जीने वाले ये लोगों को मोह माया से मुक्त रहना सिखाते हैं। सारा शहर लोगों से भरा था, हर हाथ फोन और दिखावटी चीजों से, यह जीवन का कौन सा रूप है मैं नहीं समझ पाता, बाजार आदमी से बड़ा हो गया है, अब बाजार आदमियों के दिनचर्या का हिस्सा नहीं है, बाजार की दिनचर्या में आदमी आता है, बाजार के लिए आदमी एक प्रोडक्ट है जो उसके प्रोडक्ट का उपभोग करता है। हम कहाँ जा रहे हैं.. हमारे पास अनगिन दिशासूचक यंत्र हैं फिर भी दिशा भ्रम हो गए हैं, हम गिरने की तरफ तेजी से बढ़ रहें हैं, जल्द ही जमीन ख़त्म होगी और हम गिरेंगे। हमारा गिरना जरूरी है।
अयोध्या को अयोध्या की इच्छा के बिना उघाड़ा गया, फिर सजाया गया, इसीलिए अयोध्या में वह रौनक नहीं है जो तैयार हुए व्यक्ति में होती है, बहुत दबाव में सुंदर भी असुंदर हो जाता है।
अब .................
ख़ैर आज बहुत ख़ुश हूँ इतना की ख़ुश कहते हुए लग रहा है यह शब्द कम है काश कह पाता मारे ख़ुशी के आज ख़ूब रोया हूँ, ख़्वाब टूटते हैं तो आँसू के सिवा आता क्या है, हृदयाघात तो आएगा नहीं, मगर आएगा कभी ऐसे ही ..
सब सुंदर है, सब खुशहाल हैं , यह बना रहे..
― 22 जनवरी 2025 / 9 बजे शाम
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