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क्या जीवन केवल द्वंद्व है ?

छोड़ देने से चीजें छूट जाती हैं। क्या यह सही है ? नहीं! छोड़ते जाने से चीजें छूट जाती हैं। वैसे ही जैसे रांझणा फ़िल्म में कुंदन ने डॉक्टरों द्वारा ज़बरन खींची गई साँस को  छोड़ दिया था, वैसे जैसे गाइड में देवानन्द ने अपने को छोड़ दिया था और वैसे ही जैसे मसान में देवी ने अपने भूत को छोड़ दिया था। छूटना और जुड़ना सब कुछ ऐसे ही होता है। होने की इच्छा हो तो हो जाता है। जैसे जिसके लिए तड़प हो उसके लिए समय निकल आता है। 

कभी कभी जब कोई बहुत करीबी कहता है 'समय ही नहीं निकल पाया' तो इस बात को मैं सोचता हूँ कि समय कहाँ घुसा रहता है जो निकल ही नहीं पाता, समय का अपना मन कैसे हो गया ? समय तो हमारी ही बनाई घड़ी से चलता है न ? तो फिर कैसे ? लोग सच सच क्यूँ नहीं कह देते मन में मिलने की वह तीव्रता नहीं थी जैसे दूसरों से होती हैं, जिनके लिए समय गिना ही नहीं जाता। हम वही भूल जाते हैं, हम वही छोड़ देते हैं, और हम वहीं समय नहीं निकाल पाते हैं जहाँ हम चाहते नहीं हैं। हाईस्कूल में अंग्रेजी की किताब में एक चैप्टर था 'द फॉरगेटेन' उसमें जो सिद्धांत था वह यही था। 

ख़ैर इसे भी यहीं छोड़ देते हैं खींचकर लम्बा लिखने से छोटी छोटी बातों को बढ़ा करके नहीं लिखा जा सकता है। इस सदी के लिए छोड़ना, छूटना, भूलना, यह छोटी चीज़ें ही तो हैं ,  मैं सही नहीं कह रहा हूँ ? 

कुछ कुछ दिन मैं भुला रहता हूँ कि मैं कौन हूँ। मैं लगातार इस सवाल का उत्तर ख़ोजता रहता हूँ, और हर पल एक मानसिक द्वंद्व में रहता हूँ। लिख कुछ और रहा होता हूँ लिखने कुछ लगता हूँ, बोलना कुछ चाहता हूँ बोलता कुछ हूँ, कोई मुझसे कुछ और बात कर रहा होता है उसके किसी एक शब्द की पूंछ पकड़े मैं कहीं दूर पहुँच जाता हूँ, जैसे किसी की मृत्यु होने पर गाय की पूंछ पकड़कर छोटी सी वैतरणी बनाकर सांकेतिक रूप से भवसागर पार कराया जाता है जिससे दाह देने के पाप से मुक्ति हो सके। वह भव सागर होता है या भय सागर ?  वह जरूर भय होगा, मनुष्यों को भय से ही काबू किया जा सकता है। कहीं मैं पढ़ रहा था मनुष्य भय में कहीं छिपकर बैठ जाता है पशु छटपटाने लगते हैं। इस समय का मनुष्य भी तो भी से दबा ही बैठा हुआ है, इतनी बर्बरता, इतनी बेईमानी इतने बलात्कार, इतनी भ्रष्ट न्यायपालिका के भय से दुबक गया है, हमें पशुवत एकजुट होना पड़ेगा, छटपटाहट हो आक्रोश में बदलना होगा। मगर उसके बाद क्या बदलाव होगा ? शायद कहीं होता हो , इस धरती पर क्रांतियों के बाद तो दमन और तेज हुए हैं। ये सब क्या हुआ है मुझे.. नहीं यह राह नहीं पकड़नी है। अभी अभी तो लोग उठाए गए हैं, मारे गए हैं अपने शब्दों की वजह से ही.. मैं..  नहीं भय... भय ...भय .. 

इससे कैसे बचें ? मेरा परिवार है , मुझे चुप रहना चाहिए। जो मरें क्या उनका परिवार नहीं था ? था। फिर.. 

अरे चुप रहो, ऐसे तो तुम सब भूल जाते हो यह भी भूल जाओ। भूल जाऊँ ? कैसे ? पीड़ा कैसे भूली जाती है ? मुझे नहीं आता ये । 

हद है अभी कुछ घड़ी पहले ही तो तुम कह रहे थे, छोड़ते जाने से चीजें छूट जाती हैं। फिर ये क्यूँ ? फिर से द्वंद्व

क्या तुम्हारा जीवन केवल द्वंद्व है ? हॉं या नहीं में बोलना, 

मैं चुन नहीं पाता। कवि कह गए हैं चुनना राजनीति है।

यह कहना भी तो कवि की राजनीति है। 

बस अब चुप रहो ...| 


― आशुतोष प्रसिद्ध  

डायरी 

7 जनवरी 2025 शाम 6 : 20 


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