एक कवि ने कल रात अपनी कुछ ताजा कविताएँ भेजीं थी एक सम्पादक को, उनकी मेज पर कई इच्छाओं से भरा एक पैड रखा था, शाम वो गुजर गए.. जबसे यह खबर सुनी है.. सोच रहा हूँ मैं ऐसे कब जाऊँगा, मैं मरके देखना चाहता हूँ कितनी आँखों में असल के आँसू कितने, कितने अपनी व्यस्तता के चलते भूल जाते हैं ,कितनों को याद रहता हूं मैं 13 दिन..
यह जीवन कितना नश्वर है, हम कितना फॉर ग्रांटेड लेते हैं अपनों को..हम घण्टों, हफ़्तों महीनों उनकी खबर तक नहीं लेते फिर उनके जाने पर शोक व्यक्त करते हैं। क्या अधिकार है हमें..?
काश !...
― 25 जनवरी 2025 / शाम 9 बजे
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