मैं बहुत खुशमिज़ाज किस्म का व्यक्ति नहीं हूँ। न ऐसा है कि मैं गंभीरता ओढ़े रहता हूँ। शांति ही मेरी प्रकृति है, मुझे तेज बोलना, तेज हँसना, बेवजह किसी को छूते रहना नहीं पसंद, ही हा हू भी मुझसे नहीं होता, मैं अपनी उपस्थिति में अनुपस्थित सा रहता हूँ, मुझे हर कहीं शामिल होने की भूख नहीं है। इन दिनों लोगों में जो एक स्वभाव पैदा हो गया है हर आदमी को पकड़कर फ़ोटो लेने लगना, बेवजह हर किसी को स्पर्श करते रहना, अनायास की बातों में झूठी हँसी खोज लेना, ये सब करते लोग मुझे निरे मूर्ख लगते हैं, मैं शामिल तभी होता हूँ जब कोई शामिल करे। बहुत संभावना है कि मैं प्रथम द्रष्टया पीड़ित या दुःखी सा कुछ अजीब लगूँ पर ऐसा है नहीं, मेरी नसों में बड़ी शीतलता है। मैं भीतर ही भीतर इन तमाम तरह की औपचारिकताओं में लहालोट लोगों को देखकर हँस लेता हूँ, मैं बोलने से अधिक करने वाले को बेहतर मानता हूँ, करता भी यही हूँ। यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ पता नहीं। चित्त में तरह तरह के विचार आते जाते रहते हैं। उनके आने जाने से थका रहता हूँ। जब आप कोई इच्छा पाल लें और आपको लगे यह तो होगा ही जब वह नहीं होता तो त्वरित तो भले आप मैनेज कर लें...