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अब यही रोज़गार है अपना

मैं बहुत खुशमिज़ाज किस्म का व्यक्ति नहीं हूँ। न ऐसा है कि मैं गंभीरता ओढ़े रहता हूँ। शांति ही मेरी प्रकृति है, मुझे तेज बोलना, तेज हँसना, बेवजह किसी को छूते रहना नहीं पसंद, ही हा हू भी मुझसे नहीं होता, मैं अपनी उपस्थिति में अनुपस्थित सा रहता हूँ, मुझे हर कहीं शामिल होने की भूख नहीं है। इन दिनों लोगों में जो एक स्वभाव पैदा हो गया है हर आदमी को पकड़कर फ़ोटो लेने लगना, बेवजह हर किसी को स्पर्श करते रहना, अनायास की बातों में झूठी हँसी खोज लेना, ये सब करते लोग मुझे निरे मूर्ख लगते हैं, मैं शामिल तभी होता हूँ जब कोई शामिल करे। बहुत संभावना है कि मैं प्रथम द्रष्टया पीड़ित या दुःखी सा कुछ अजीब लगूँ पर ऐसा है नहीं, मेरी नसों में बड़ी शीतलता है। मैं भीतर ही भीतर इन तमाम तरह की औपचारिकताओं में लहालोट लोगों को देखकर हँस लेता हूँ, मैं बोलने से अधिक करने वाले को बेहतर मानता हूँ, करता भी यही हूँ। यह सब क्यूँ लिख रहा हूँ पता नहीं।  चित्त में तरह तरह के विचार आते जाते रहते हैं। उनके आने जाने से थका रहता हूँ। जब आप कोई इच्छा पाल लें और आपको लगे यह तो होगा ही जब वह नहीं होता तो त्वरित तो भले आप मैनेज कर लें...

रात्रिदग्ध एकालाप

जाने क्यूँ कल से लगातार मैं दो चीजें कर रहा हूँ, एक तो एक गाने को लगातार गाए जा रहा हूँ वो भी ऐसे गाने को जिसको सुना नहीं है शायद सालों से, जो मुझे पसंद भी नहीं है। यह अजीब लग सकता है कि पसंद नहीं है तो याद कैसे है और गा कैसे रहा हूँ, लेकिन यही सच है।  दूसरा यह कि मुझे बार बार जाने क्यूँ जड़त्व का नियम याद आ रहा है। पिछले दो साल से मैं महसूस कर रहा हूँ कि मैं स्मृति में घूमता रहता हूँ, भौतिकी पढ़े मुझे 8 साल हो गए होंगे या ज्यादा पर अब मुझे उसके एक सिद्धांत सूत्र और परिभाषा याद आते हैं। इसका क्या अर्थ है पता नहीं ! जड़त्व का नियम याद करते रहना चाहिए। जीवन का नियम भी यही है।  *********** मैं समझ नहीं पाता हूँ समय तेजी से गुजर रहा है या घटनाएं तेजी से घट रहीं हैं। मन लगातार भावनात्मक उठापटक का मैदान बना रहता है, एक पल को मन खुश होता है, एक पल को सशंकित, एक पल को चिड़चिड़ा, एक पल को रोमांटिक, एक पल को भयभीत, एक पल को अकेला, एक पल को बिल्कुल बुद्धू, एक पल को विशुद्ध वैचारिक, एक पल को आशंका से भरा हुआ, एक पल को बच्चा, एक पल को बड़ा, एक पल को भाई, एक पल को प्रेमी, एक पल को बेट...

कह देने भर के लिए न कहते हुए..

इन दिनों सब कुछ उन दिनों से बिल्कुल अलग है जिन दिनों हम इन दिनों के विषय में सोचते हुए कहते थे साधन जीवन आसान करेंगे। साधन ने जीवन मुश्किल किया, छिपने के और रास्ते दिए, चोरी के कई कई तरीके, मारने के अनगिन हथियार ऐसे हथियार जो पैने नहीं होते, जो काटते नहीं कुचलते हैं या पीस देते हैं। धोखे बाजी के विकल्प ही विकल्प हैं। इन दिनों कुछ भी गम्भीर नहीं, यह सबसे गम्भीर विषय है।  इन दिनों संवेदनशील शब्द सबसे अधिक असंवेदनशील लोग उपयोग करते हैं। इन दिनों भाषा फूल की पंखुड़ी की तरह नहीं भाले की नोक की तरह चूभते हैं। इन दिनों सबसे कु-कर्मी वही हैं जिन्होंने सुकर्म के पाठ लिखे।  इन्हीं दिनों मैं हर रोज सोचता हूँ शब्दों का साथ छोड़ दूं, और हर रोज कुछ ऐसा घटता है कि शब्द स्वतः झरने लगते हैं मुझसे जैसे जबरन झिंझोड़ने से गिरते हैं पेड़ से कचे पके सारे फल  मैं धीरे धीरे द्वंदों को सुलझा रहा हूँ और उन प्रश्नों के उत्तर की तरफ जा रहा हूँ जो मैं लगभग 20 दिनों से तलाश रहा था। सच बेहद सीधा होता है, चुप्पी या एक भी अतिरिक्त शब्द से सच झूठ हो जाता है। हमें सबसे नहीं बस उस एक व्यक्ति से सच क...

अनुस्यूत

आह और कराह के स्वरों में ध्वनि नहीं होती है। ये बिना ध्वनि के एक अदृश्य तरंग की तरह कम्पित करते चलते हैं। यह जहाँ टकराते हैं गहरा घाव करते हैं, गहरा इस अर्थ में कि इनका कोई रूप तो होता नहीं कि कहा जा सके फलाँ व्यक्ति की आह से इतनी चोट लगी, या उसकी कराह की तीव्रता इतनी थी कि मेरा दिल फलाँ इंच या फलाँ सेंटीमीटर पसीज गया।  हमारी संवेदना व्यक्ति बद्ध होती है। उसे चोट बीमारी या कोई तकलीफ से फ़र्क तभी पड़ता है जब वह किसी ऐसे व्यक्ति को हो जिसकी वजह से हमारी दिनचर्या प्रभावित होती है।  ********* न जाने किसने कहाँ कहा है कि ' जो हमारे बिना रह सकते हैं, उन्हें हमारे बिना ही रहना चाहिए ' ये वाक्य बीते महीने में मुझे लगातार रह रह कर याद आता रहा।  ******** हम सबसे सच्चे प्रेम में होते हैं, और झूठ भी प्रेम में ही प्रेम के लिए बोलते हैं। मैंने बहुत झूठ बोले हैं। मुझे उसपर कोई पछतावा नहीं होता, मौका मिला तो भविष्य में और बोलूँगा बोलता रहूँगा। मगर अपने प्रिय से नहीं, प्रिय के साथ रहने के लिए और तमाम दुनिया से... झूठी दुनिया से झूठ बोलने के क्या ही दिक्कत है।  ********** अगर आप यह देखन...

सूखे दिए की रौशनी में

कोई एक आवाज, कोई एक तस्वीर, कोई आँख, जिसमें अपने को देखा जा सके, कोई मन जहाँ हम दुनिया की हर शय से पहले हों, कोई एक शब्द, कोई एक सरल सा शब्द, या पुकार जिससे आप पुकारे जाना चाहते हों आपके दिनभर की या शायद हफ्ते या महीने भर की ताकत होता है, हम उसी अनुगूँज को बार बार सुनते हैं, कान के पास धीरे से सँकोचित आवाज में दो होंठो से निकली ध्वनि में नाचते रहते हैं। जैसे ढिबरी की बाती के रेशों से चढ़ते तेल से ज्योतिर्मय रहती है ढेबरी बिल्कुल वैसे आदमी अपनी पसंदीदा आवाज़ और स्पर्श में .. जैसे जैसे वह तेल कम होता है पहले कपड़ा जलता है, फिर ढिबरी बुझ जाती है, दुबारा जलाने के लिए हमें कपड़ा बदलना पड़ता है। कपड़ा बचा रहे इसके लिए जरूरी है तेल मिलता रहे, कपड़ा आदमी की शक्ल है। तेल उसके साथी का प्रेम। ****** मैं महीने भर से लगभग माचिस खरीदने की सोच रहा हूँ, लगभग हर तीसरे या चौथे दिन सोचता हूँ आज तो माँग ही लूँगा पर नहीं माँग पाता, हर मंगलवार जब नहा कर खड़ा होता हूँ तो अपने को कोसता हूँ, और हर दिन दूध लेकर लौटते सोचता हूँ, माँग लेना चाहिए था। पर न जाने कौन सा संकोच बैठा है, मैं माँग ही नहीं पाता, घर के...

जैसे आँसू की यमुना पर छोटा-सा खद्योत

तुमसे बात करने की तीव्र इच्छा है। ऐसा लग रहा है रह रह कर कोई काँटा चुभो रहा है भीतर। पर बात क्या करूँगा पता नहीं। तुम्हारे सवाल का जवाब दे पाउँगा यह भी नहीं पता। मैं तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहता हूँ। वही जिसमें शांति है। स्थिरता है। कुछ करते रहने का भार है। किसी मजबूरी का बोझ है। कौन सी पता नहीं। मैं जब जब तुमसे बात करता हूँ लगता है तुम कहीं दबी सी बोल रही हो। तुम्हें क्या कौन सा डर खाए जा रहा है पता नहीं। मैं जब तुम्हारे करीब भी होता हूँ और तुमसे वैसा व्यवहार नहीं पाता जैसा चाहता हूँ तो मेरे भीतर वह व्यवहार न पाने का शोक नहीं होता, ऐसा क्यूँ नहीं है ? किस बात की कचोट कौन सा अनुभव छीन ले गया तुमसे ऐसा व्यवहार इसकी चिंता खाए जाती है। तुम पूछती हो क्या सोचते रहते हैं हमेशा ? यही। कैसे बताऊं इसे कि यह डर बना रहता है। मैं भीतर बन रही चोट से ज्यादा तुम्हारे भीतर बने घाव की पीड़ा से व्यथित हुआ रहता हूँ। मैं जानता हूँ हर दर्द, हर नकार, हर संकोच का एक अतीत होता है। और हर अतीत की अपनी पृष्ठभूमि उसे मिटाई नहीं जा सकती। उस पर और रंग तो चढ़ाए जा सकते हैं न ? जिससे वह दिखे न..  सुबह से न जाने क्या क...

क्या ये कम है मसीहा के रहने ही से मौत का भी इरादा बदल जाएगा

बहुत कुछ सोच विचार और जी लेने के बाद अंततः जब अपने साथ बैठता हूँ आँख बंद करता हूँ तो खुद से कहता हूँ ;  बक रहा हूँ जुनू में क्या क्या कुछ/ कुछ न समझे खुदा करे कोई   कोई यानि बाहरी कोई, वो एक समझे जिससे बकता हूँ, उसके समझने में बचे रहना महसूस होता है। मेरा ध्यान और योग सब लिखने से ही होता है, मैं सबसे ज्यादा बुरी मानसिक प्रताड़ना से तब गुजरता हूँ ,जब मैं लिख नहीं पाता और उससे बात नहीं कर पाता, बात करने जैसी बात, हाल चाल लेने वाली बात नहीं।  सुबह सुबह एक सवाल से जुझा कुल्ला भी बाद में किया जबसे उठा, वो किया जो नित करता हूँ, उसकी तस्वीर देखी, आवाज़ सुनी, और लग गया जमीन( फर्श ) पर बैठकर उन चीज़ों को खोजने और लिखने में जो करना था। किया। बहुत संतुष्ट नहीं हूँ। मगर ठीक है। यह सब करने के बाद.. देर तक अकेले अपना हाथ पाँव समेटे बैठा रहा, सोचता रहा मैं कितना दोहरा चरित्र व्यक्ति हूँ , जिस मुद्दे पर सारी दुनिया से बात कर रहा हूँ, उससे अपने ही सबसे करीबी साथी से बात नहीं करता, मैं तो करना चाहता हूँ, वह नहीं करती ? वही दबाव है जो हम सब पर होता है। मैंने उससे कभी यह तक नही...

फिर वही रात है... रात है ख़्वाब की...

किसी का शेर है कि ; रो रो के किस तरह से कटी रात क्या कहें / मर मर के कैसे की है सहर कुछ न पूछिए  बात कुछ कुछ यही है मगर ख़ैर..  रात सुंदर थी। वो रातें सुंदर होतीं हैं जिनमें साथी मन खुलकर कह दे। ऐसे अवसर कम ही होतें हैं। जब मन सच सच कहा जाता है। दुःख और सुख की अनुभूति एक ही क्षण में होती है। रोया। लेकिन रोने को सुबह तक भूल गया। वो साथ कभी नहीं टूटता जिनमें दोनों पक्षों में एक दूसरे को पकड़े रहने की ललक हो.. ज़िद हो पर इस साथ के लिए हो।  तुम्हारी आँख से गिरे एक एक बूंद आँसू पर मेरे होंठो का  हक है, भले मैं उस दिन नमक न खाऊं मगर तुम्हारे आँसू नहीं गिरने दूँगा। जब जब तुम्हारी आँखों से आसूँ आते हैं मुझे लगता मेरा कोई पाप तुम्हारे हिस्से गया, जो नहीं होना चाहिए। मुझे तुम्हारा सब दुःख सोख लेना है, मुझमें अथाह सामर्थ्य है। तुम हमारे प्रेम को गर्भ में रख सकती हो तो मैं तुम्हें.... हमें हमारे आँसू और क़रीब ले आते हैं। आँसू ही हैं जिनमें कोई तीसरा नहीं होता बस हम होते हैं। रात दो बजे से ही फोन में एक अलार्म बज रहा है, उसे मैं जान बूझ कर बन्द भी नहीं कर रहा हूँ। जब वो ब...

काश ! फरवरी कल ही बीते

कभी डर से इस शहर से भागता हूँ, कभी फिर जीने का सहारा खोजते लौट आता हूँ। शहर जाम से पटा पड़ा है। आदमियों से ज्यादा गाड़ियां हैं। मुझे बन्द गाड़ियों में यात्रा करना बहुत खलता है। सिर फटने लगता है, उल्टियां होती हैं। हुआ भी वही सब..  लोग इतने अनियंत्रित और अव्यवस्थित हैं कि उन्हें देख देख कर मन में क्रोध भर जाता है। रास्ता आँख मुँह बन्द किए जैसे तैसे कटा, 9 किलोमीटर की पद यात्रा के बाद जैसे तैसे कमरे पर पहुँचा..  आज कमरे पर पहुँचने की जल्दी नहीं थी। बस था कि पहुँच जाऊँ, उस गन्ध के आसपास, उन चीज़ों के आसपास जहाँ से दूरी का आभास घटता है। फूल सूख गए हैं, इतने की छू दिया तो धूल की तरह बिखर गए, इन्हें उसके लिए लाया था, उसे सफेद फूल बहुत पसंद हैं, महीनों से उसे दे नहीं पाया, आज एक जगह देखा, मगर लेने का कोई अर्थ महसूस नहीं हुआ.. किसी दिन मैं फूलों की दुकान खरीदकर उसे दे दूँगा । मन तो आज ही था मगर दूँगा कैसे ? कह भी तो नहीं सकता.. नीचे आओ जरा.. गली में खड़ा हूँ '  शहर में इतनी भीड़ है, इतने लोग लेकिन एक अनुपस्थिति सबको अर्थहीन कर देती है, लग रहा है कोई नहीं है। कहाँ ही है कोई ...

प्रीति रहै इकतार

                  एक शब्द है 'होना' आपने इसे किस तरह जिया है ? आप किसी के लिए कितना वह हो पाए जो वह चाहता है ? क्या यह कहना अनुचित होगा कि यूँ ही होने से बेहतर होता है किसी के लिए होना, किसी का होना।  यह बिन सिर पैर की बात है क्योंकि इस बात का सिर और पैर तर्क से देखा नहीं जा सकता। यह भावनात्मक अनुभूति है जो यूँ ही छोटी बहन से संवाद करते हुए एक वाक्य के श्रवण मात्र से मेरे भीतर उपजी, भीतर जैसे कुछ कौंधा मैं देर तक सोचता रहा उस वाक्य को, देर तक सोचने के बाद  मुझे महसूस हुआ कि ऐसे वाक्य परिवार में ही बोले सुने जा सकते हैं। क्या कभी किसी ने आपसे बोला की वह आपको अकेले छोड़कर नहीं जाएगा ? नहीं बोला होगा ! मुझसे नहीं बोला किसी ने मैं हर जगह अकेला छूट जाता हूँ। घर परिवार में, रिश्ते में, दोस्तों में, अपने में भी.. क्यूँ ? पता नहीं। शायद मैं सबके साथ होने का प्रयास करता रहता हूँ इसीलिए।  'प्रीति रहै इकतार' इसे फिर पढ़िए, पढ़ा ? अब बताइए कुछ समझ आया ? नहीं आया तो फिर पढ़िए, हर चीज व्याख्यायित नहीं की जा सकती है। यह कबीर के एक दोहे के द्व...

इस राह में जो सब पे गुजरती है वो गुजरी

अपना तमाम जीवन निचोड़कर भी वह नहीं हो पा रहा हूँ जो होने का सपना बुनता हूँ। सिर्फ़ सपना ही नहीं बुनता अपने सामर्थ्य से बढ़कर श्रम करता हूँ। पिछले 15 सालों से नहीं जानता हूँ अपने लिए जीना किसे कहते हैं, अपने आप से पहले जुड़े लोगों का सोचा उम्र से कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला, मैं नहीं जानता बचपना कुछ होता है, या बैचलर जैसी ज़िंदगी होती है, हमेशा लगा मैं जिम्मेदार हूँ, यह मुझमें किसी ने भरा नहीं या न जाने कैसे आ गया, बहनों को बेटियों की तरह महसूस किया, प्रेम किया तो अपने कहे से अधिक जिम्मेदार हो गया , प्रेमी की तरह कभी जिया ही नहीं, मन मारने की ट्रेनिंग मैं वर्षों से ले रहा हूँ।  मुझे मांगना और मरना एक जैसा लगता है मगर प्रेम माँगा .. हाँ माँगा। मैंने उसी एक स्त्री से कुछ माँगा.. उसने अपने भीतर का डर तोड़पर मुझे स्वीकार किया। मगर समाज हमारे गले पड़ा रहा, सच्चाई, और पवित्रता जैसी दो-मुँही तलवार हमेशा हमारे बीच लटकी रही, हम गले भी लगे तो अगले ही पल एक दूसरे से दूर को गए की पवित्रता न भंग हो जाए, हम अपने परिवार की दृष्टि में झूठे न हो जाएं.. जबकि यह बस हमारा व्यक्तिगत चुनाव होना चा...