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सूखे दिए की रौशनी में


कोई एक आवाज, कोई एक तस्वीर, कोई आँख, जिसमें अपने को देखा जा सके, कोई मन जहाँ हम दुनिया की हर शय से पहले हों, कोई एक शब्द, कोई एक सरल सा शब्द, या पुकार जिससे आप पुकारे जाना चाहते हों आपके दिनभर की या शायद हफ्ते या महीने भर की ताकत होता है, हम उसी अनुगूँज को बार बार सुनते हैं, कान के पास धीरे से सँकोचित आवाज में दो होंठो से निकली ध्वनि में नाचते रहते हैं। जैसे ढिबरी की बाती के रेशों से चढ़ते तेल से ज्योतिर्मय रहती है ढेबरी बिल्कुल वैसे आदमी अपनी पसंदीदा आवाज़ और स्पर्श में .. जैसे जैसे वह तेल कम होता है पहले कपड़ा जलता है, फिर ढिबरी बुझ जाती है, दुबारा जलाने के लिए हमें कपड़ा बदलना पड़ता है। कपड़ा बचा रहे इसके लिए जरूरी है तेल मिलता रहे, कपड़ा आदमी की शक्ल है। तेल उसके साथी का प्रेम।


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मैं महीने भर से लगभग माचिस खरीदने की सोच रहा हूँ, लगभग हर तीसरे या चौथे दिन सोचता हूँ आज तो माँग ही लूँगा पर नहीं माँग पाता, हर मंगलवार जब नहा कर खड़ा होता हूँ तो अपने को कोसता हूँ, और हर दिन दूध लेकर लौटते सोचता हूँ, माँग लेना चाहिए था। पर न जाने कौन सा संकोच बैठा है, मैं माँग ही नहीं पाता, घर के लिए लेना होता है तो वो सामान के साथ पर्ची में लिखा होता है मैं बस खड़े होकर देखता रहता हूँ, लेना भी एक पैकेट होता है, यहाँ महीने में 4 दिन काम लगता है, अब एक डिब्बी माँगू कैसे.. मुझसे थोड़ा सा कुछ नहीं होता। और मन यह भी सोचता है कि बाबा सोचेंगे सिगरेट तो नहीं पीने लगा। अभी आज शाम मैं किचन का ढेर सामान ले रहा था, कई बार ज़बान तक आया एक माचिस फिर गटक गया, नहीं कह पाया, ऐसा माचिस के साथ नहीं है, लगभग हर चीज के साथ है। बोलने से पहले वो शब्द वो भाव मेरे भीतर इतना चलता है उस पर होने वाली हर प्रतिक्रिया सोच जाता है मन ,जबकि यह सारी प्रक्रिया मेरे वश में नहीं होती बस वो होती रहती है फिर अगर मेरे बोलने के बाद नकारात्मक या कुछ अलग प्रतिक्रिया होती है तो मैं सहन ही नहीं कर पाता। पता नहीं क्यूँ.. पापा इसी सब बात पर कहते हैं तुम गलत लोगों के बीच पैदा हो गए हो.. 


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तुम्हारी बहुत आई..मैं बरसात में खड़े होकर रोया। ख़ूब रोया, ऐसी की किसी बरसात में मैं अपने होठों में तुम्हारे होंठ लिए भीगना चाहता था.. और हम..


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भारत युद्ध के मुँह पर खड़ा होगा पुलुलु कर रहा है, पाकिस्तान उन कुछ चंद लोगों में है जो मार खाते जाते हैं और कहते जाते हैं लगा नहीं, या बेवजह चिल्लाते हैं। कटोरा लिए चीन और अमेरिका औऱ तुर्की घूम रहा है लेकिन लड़ना है। भारत को पाकिस्तान पर आक्रमक होने की जरूरत है, मैं जानता हूँ वह हमारा ही जना है हमारे लोग हैं वहाँ पर.. रोज रोज लोगों की गिरती लाशों पर कब तक सरकार संवेदना के झूठे आँसू बहाएगी। कुछ कठोर होना पड़ेगा। होना चाहिए। 

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महीनों बाद आज डायरी लेकर बैठा हूँ हाथ काँप रहा है। 

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मैं अपनी नियति से लड़ रहा हूँ। यह जानते हुए कि मेरी हार निश्चित है

― 11 मई 2025 / 11:40 रात

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