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बसंत का पीलापन

धारा एक बार टूट जाए तो फिर उसमें वो रवानी भी टूट जाती है। धारा फिर लौट सकती है रवानी नहीं लौटती। मन किसी व्यक्ति, वस्तु, जगह, या भाव से एक बार हट जाए तो फिर जुड़ता नहीं है, उसमें न वह विश्वास बचता है न पहले सी टीस... हम फिर एक सामाजिक गरिमा को जीते हैं सम्बन्धों को नहीं। मन भी ऐसा ही है जब उसे बार बार तोड़ा जाए, वह कहा जाए जो नहीं कहना चाहिए, वह दिया जाए जो वह स्वतः स्वीकार नहीं करना चाहता तो फिर मन धीरे सूख जाता है। यह वैसे ही है जैसे किसी पौधे की कटिंग करना और उसे बढ़ने का अवसर न देना। कटिंग तब ठीक है जब बढ़ने का अवसर दिया जाए अन्यथा पौधे सूख जाते हैं। सूख जाना भी चाहिए।  *********** आज बसंत पंचमी है, आज ही की तिथि पर पहली बार महाप्राण की कविता ' वीणा वादिनी वर दे' पढ़ी थी, तब शायद मैं छठवीं में था, मेरे हाथ पाँव काँप रहे थे, मुझे मुख्य बनना कभी पसंद नहीं था मैं नेपथ्य में रहना चुनता था, मगर क्रेडिट की इच्छा बनी रहती थी, बचपन में.. अब कोई फर्क ही नहीं पड़ता।  मैं कोई हूँ.. यह भी अब जल्दी सोचता ही नहीं। ऐसी ही एक तिथि को जब मैं आठवी में था तो एक नाटक बनाया था, नेता कार्...