सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

life thought लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वह जो करता रहा दिनभर

इधर कुछ दिनों से सुबह सुबह की तरह होती है, रात जल्दी आँख बन्द कर लेने का प्रयास करता हूँ, जो जो बन पड़ता है वो जतन करता हूँ कि सो जाए, और सो जाता हूँ। अपने और अपनों दोनों को रूटीन में लाने का प्रयास कर रहा हूँ। रात देर तक कुछ संवादों पर मन मस्तिष्क चल रहा था कुछ घटनाओं पर भी..  मन टूट जाता है कई बार जब बहुत करीबी व्यक्ति दो आँख करते दिखता है। कई बार संवाद से भी वह नहीं समझाया जा सकता है जो सच सच कहना चाहते हैं, कहे को अलग ढंग से इन्टरप्रेट कर लिया जाता है और वो तमाम बात बेअर्थ और बेमानी हो औसत बनकर रह जाती हैं जिनका अर्थ हो सकता था.. ख़ैर कवि कह गया है कि आदमी की नियति है न समझे जाना, यहाँ आदमी जेंडर विशेष के लिए नहीं, सम्पूर्ण मनुष्य जाति के लिए है।  रोता हूँ और रोते हुए सोचता हूँ अब नहीं रोऊंगा। अब छिपकर रोता हूँ, पहले उसके सामने भी रो पड़ता था।  दिन भर में कुछ विशेष किया नहीं, एक काम जिम्मे लिया है, धन के लालच वश उसका एक अध्याय आज पूरा हुआ। मैं कभी कभी सोचता हूँ जिस दिन दिमाग ठीक ठीक काम कर देता है उस दिन मैं दिन भर में कई पन्ने पढ़ लिख दोनों लेता हूँ , जिस दिन...

तारीख़ जल्दी क्यूँ नहीं पलटती ?

दिनचर्या वैसी ही थी जैसी कोई सुनना नहीं चाहता। तो छोड़ देते हैं। नया कुछ नहीं हुआ। वही दौड़भाग वही थकन। ऊब घेरे रहती है। न चाह कर भी रह रहा हूँ यहाँ... कहाँ होना चाहता हूँ ? यह भी नहीं पता। शायद पता भी है। कहूँगा तो विश्वास नहीं होगा, इतने लोग भरे हैं पर मैं अकेले हूँ। पिछले दस दिनों से स्थिर होकर उतनी ही देर बैठता हूँ जितनी देर डायरी लेकर बैठता हूँ। आसपास क़रीबी ही क़रीबी हैं मगर सब इतने दूर की किसी को यह तक खबर नहीं कि मैं.. हूँ या कहाँ से दौड़ कर आ रहा। बहने न हो तो मैं सम्भव है भीड़ की तरह गिन लिया जाऊँ। गलती मेरी भी है, मैं व्यवस्था करके हट लेता हूँ। ख़ैर... उम्मीद साली।  मैं कुछ दिन को कहीं भाग जाना चाहता हूँ। लिखते ही ख़्याल आ रहा है पिछले तीन साल से यह वाक्य सैकड़ों बार तो लिख बोल चुका होंउँगा ही। कुछ अर्थ निकला ? कुछ भी नहीं। वही मजबूरी। वही औपचारिकता। वही रोना । वैसा ही इंतज़ार। वैसा ही परिणाम। असफलता की जिल्द पर जिल्द चढ़ती जा रही है। जीवन लगभग यथावत है। क्या मैं प्रयास नहीं कर रहा ? अगर नहीं कर रहा तो फिर तकलीफ क्यूँ है ? कर तो रहा हूँ। मेरी हर मेहनत निष्फल होती जा रही है। सभी जतन...

मन-विषयक

जिस एक क्षण का इंतज़ार आप क्षण के सबसे निम्नतम ईकाई को भी गिनते हुए कर रहे हों, वह जब सामने होता है तो आप अ-चेत से हो जाते हैं।  मन में इतनी उथपुथल होती है कि जबान समझ ही नहीं पाती कौन सी बात बोलें कौन सी नहीं, अनन्तः होता यह है हमें चुप्पी जकड़ लेती है। आज भी वही हुआ.. जो होता आया है। दिनों से मन में बने एक एक सपने अनगिन संवाद सब गायब हो गए, मैं निःशब्द सा खड़ा रहा। मन किया काश मेरी अँकवार इतनी बड़ी हो जाती अभी की शर्म और झिझक सहित उसे समेट पाता.. पर यह कहाँ सम्भव है। वह आई चली गई..महसूस करने भर का भी समय नहीं दिया समय ने। भीतर केवड़े के फूल की सी महक भर रही थी अचानक वो उड़ गई। महक को कैद भी तो नहीं किया जा सकता। खैर ठीक है.. जिस स्पर्श के लिए हम तड़प रहें हो उसे स्पर्श न कर पाने के बाद जो टीस पैदा होती है... उसे कहा तो नहीं ही जा सकता। हम कुछ ही आँखों में तो इंतज़ार देखना चाहते हैं.. और तो सब एक दूसरे से ऊबे ही हुए हैं।  मैं इतना हल्का क्यूँ नहीं हो पा रहा हूँ कि हर चीज़ त्वरित रूप में स्वीकार लूँ और जैसे मिल रहा हो उसे वैसे स्वीकार लूँ ? मेरी मिट्टी हमेशा पूर्ण सत्य और पूर्ण समपर्ण ...